कुछ उधर से कुछ इधर से भी बहुत तोड़ा हमें
इस मुसीबत ने भी हर इक मोड़ पे मोड़ा हमें
चंद सिक्कों की क़दर इज़्ज़त से भी ज़्यादा हुई
रोटियाँ जब माँगी तो अपनों ने भी छोड़ा हमें
रोज़ उठते रोज़ मरने के लिए ऐ ज़िंदगी
इस ग़रीबी ने कहीं का भी नहीं छोड़ा हमें
— Usman Saifi















