रात दिन जब सफ़र में गुज़ारे हुए
तब नदी को मुकम्मल किनारे हुए
इश्क़ है तो यही, बोलना लाज़मी
तुम हमारी हुईं, हम तुम्हारे हुए
ख़ुद गिरे यार, उस को ना गिरने दिया
जिस किसी के कभी हम सहारे हुए
इतने तो ख़ूब-सूरत सितारे नहीं
जितने हैं, झुमके उस के उतारे हुए
क्या सिखाए तुम्हें, इश्क़ को जीतना
यार हम हैं, यही खेल हारे हुए
— vivek sahu















