"किताबें"
किताबें सोई हुई हैं
अलमारियों में सुकून से
यूँ देखते हुए ख़्वाब
कोई तो जगा दे उन को
धूल इतनी है उन पर
जैसे लिपटी हुई हैं
दिल से चाहती हैं किताबें
कोई तो छू ले उन को
दिमाग़ की अलमारी
जिस से खुलती है
उन चाबियों के बारे में
कोई तो पूछे उन को
ये फ़ेसबुक व्हाट्सएप
इंस्टाग्राम से मिले जो फ़ुर्सत
किताबें चाहती हैं आशिक़ ऐसे
कोई तो मिले उन को
दिल में लिए बैठे हैं
कितने राज़ यादें तजरबा बहुत कुछ
किताबें चाहती हैं बैठ के
कोई तो पढ़े समझे उन को
— Vinod Ganeshpure














