"राहत"
सजने सँवरने का है
इक बस लालच उस को
देख उस को ता'रीफ़ कर दूँ
इक बस चाहत उस को
मुझे अच्छा लगे कुछ भी
उस की कोई भी तो ख़ूबी
मिल जाती है फिर उसे बड़ी
इक बस राहत उस को
यूँ मिले न मिले भी
रूठती नहीं वो कभी भी
मुझे उस की याद सता हर पल
इक बस चाहत उस को
कौन है दिल को दिल देने वाला जहाँ में
बुलाने पर उस के सिर्फ़ मैं
सब कुछ छोड़ आ जाऊँ उस के लिए
फिर मिलती है इक बस राहत उस को
— Vinod Ganeshpure














