बँट चुका हिस्सा मेरा मुझ में बचा कुछ भी नहीं
अब तो हिस्से में मेरे तेरे सिवा कुछ भी नहीं
बाद गिरने के मुझे लोगों ने तो जोड़ा बहुत
हाँ मगर मलबे से मेरे फिर बना कुछ भी नहीं
क्यों लगाए बैठे हो उम्मीद इंसानों से तुम
क्या नज़र में अब तुम्हारी वो ख़ुदा कुछ भी नहीं
तेरी यादों को मैं भूलूँ भूल जाऊँ तुझ को भी
और इस दिल में रहे तुझ से जुड़ा कुछ भी नहीं
मैं परस्तार-ए-मोहब्बत हूँ अज़ल से दोस्तो
सामने मेरे तुम्हारी ये अना कुछ भी नहीं
— Abdul Rahman "Vaahid"















