मैं अपनी नींद को अपडेट कर के देखूँगा
फिर अपने ख़्वाब को रीसेट कर के देखूँगा
हक़ीक़तों से अलग आज इक हसीं मंज़र
मैं अपने ज़ेहन में जनरेट कर के देखूँगा
ये जानता हूँ कोई लौटता नहीं जाकर
मगर मैं फिर भी तेरा वेट कर के देखूँगा
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Wajid Husain Sahil
our suggestion based on Wajid Husain Sahil
As you were reading Khwab Shayari Shayari