दिल उन से लगाया है मैं ने

दुनिया को सजाया है मैं ने

माँगा नहीं कुछ भी दुनिया से
जो पाया कमाया है मैं ने

पत्थर को पिघलते देखा है
जब अश्क बहाया है मैं ने

जब शे'र कहे महफ़िल रोई
ये दर्द जगाया है मैं ने

शोहरत का ये कैसा मेला है
हर शख़्स गँवाया है मैं ने

जो भी माँगा मौला से वो
ऐ 'काज़ी' पाया है मैं ने

— Wasif Quazi

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