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मस्ती-ए-गाम भी थी ग़फ़लत-ए-अंजाम के साथ
दो घड़ी खेल लिए गर्दिश-ए-अय्याम के साथ
दो घड़ी खेल लिए गर्दिश-ए-अय्याम के साथ
तिश्ना-लब रहने पे भी साख तो थी शान तो थी
वज़-ए-रिंदाना गई इक तलब-ए-जाम के साथ
जब से हंगाम-ए-सफ़र अश्कों के तारे चमके
तल्ख़ियाँ हो गईं वाबस्ता हर इक शाम के साथ
अब न वो शोरिश-ए-रफ़्तार न वो जोश-ए-जुनूँ
हम कहाँ फँस गए यारान-ए-सुबुक-गाम के साथ
उड़ चुकी हैं सितम-आराओं की नींदें अक्सर
आप सुनिए कभी अफ़्साना ये आराम के साथ
इस में साक़ी का भी दर-पर्दा इशारा तो नहीं
आज कुछ रिंद भी थे वाइज़-ए-बदनाम के साथ
ग़ैर की तरह मिले अहल-ए-हरम ऐ 'ज़ैदी'
मुझ को यक-गो न अक़ीदत जो थी असनाम के साथ
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तेरी महफ़िल के भी आदाब कि दिल डरता है
मेरी आँखों ने दुर्र-ए-अश्क लुटाए तो नहीं
छान ली ख़ाक बयाबानों की वीरानों की
फिर भी अंदाज़-ए-जुनूँ अक़्ल ने पाए तो नहीं
लाख पुर-वहशत ओ पुर-हौल सही शाम-ए-फ़िराक़
हम ने घबरा के दिए दिन से जलाए तो नहीं
अब तो इस बात पे भी सुल्ह सी कर ली है कि वो
न बुलाए न सही दिल से भुलाए तो नहीं
हिज्र की रात ये हर डूबते तारे ने कहा
हम न कहते थे न आएँगे वो आए तो नहीं
इंक़िलाब आते हैं रहते हैं जहाँ में लेकिन
जो बनाने का न हो अहल मिटाए तो नहीं
अपनी इस शोख़ी-ए-रफ़्तार का अंजाम न सोच
फ़ित्ने ख़ुद उठने लगे तू ने उठाए तो नहीं
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उम्र का दिल है मुज़्महिल ज़ीस्त है दर्द-ए-मुस्तक़िल
ऐसे निज़ाम-ए-दहर में वसवसा-ए-अज़ाब क्या
नग़्मा ब-लब हैं कियारियाँ रक़्स में ज़र्रा-ए-तपाँ
सुन लिया किश्त-ए-ख़ुश्क ने ज़मज़मा-ए-सहाब क्या
चेहरा-ए-शब दमक उठा सुर्ख़ शफ़क़ झलक उठी
वक़्त-ए-तुलू कह गया जाने आफ़्ताब क्या
रिंदों से बाज़-पुर्स की पीर-ए-मुग़ाँ से दिल-लगी
आज ये मोहतसिब ने भी पी है कहीं शराब क्या
शम्अ'' थी लाख अध-जली बज़्म में रौशनी तो थी
वर्ना ग़म-ए-नशात में रौशनी-ए-गुलाब क्या
ग़ैर की रह-गुज़र है ये दोस्त की रह-गुज़र नहीं
कौन उठाएगा तुझे देख रहा है ख़्वाब क्या
मुद्दतों से ख़लिश जो थी जैसे वो कम सी हो चली
आज मिरे सवाल का मिल ही गया जवाब क्या
हाँ तिरी मंज़िल-ए-मुराद दूर बहुत ही दूर है
फिर भी हर एक मोड़ पर दिल में ये इज़्तिराब क्या
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गिर्दाब महव-ए-रक़्स है तूफ़ान महव-ए-जोश
कुछ लोग शौक़-ए-मौज में साहिल से आए हैं
ये वज़-ए-ज़ब्त-ए-शौक़ कि दिल जल बुझा मगर
शिकवे ज़बाँ पे आज भी मुश्किल से आए हैं
आँखों का सोज़ दिल की कसक तो नईं मिली
माना कि आप भी उसी महफ़िल से आए हैं
ये क़श्क़ा-ए-ख़ुलूस है ज़ख़्म-ए-जबीं नहीं
हर चंद हम भी कूचा-ए-क़ातिल से आए हैं
दिल का लहू निगाह से टपका है बार-हा
हम राह-ए-ग़म में ऐसी भी मंज़िल से आए हैं
दिल इक उदास सुब्ह नज़र इक उदास शाम
कैसे कहें कि दोस्त की महफ़िल से आए हैं
छेड़ा था नोक-ए-ख़ार ने लेकिन गुमाँ हुआ
ताज़ा पयाम पर्दा-ए-महमिल से आए हैं
हाँ गाए जा मुग़न्नी-ए-बज़्म-ए-तरब कि आज
नग़्में तिरी ज़बाँ पे मिरे दिल से आए हैं
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दीन ओ दिल पहली ही मंज़िल में यहाँ काम आए
और हम राह-ए-वफ़ा में कोई दो गाम आए
और हम राह-ए-वफ़ा में कोई दो गाम आए
तुम कहो अहल-ए-ख़िरद इश्क़ में क्या क्या बीती
हम तो इस राह में ना-वाक़िफ़-ए-अंजाम आए
लज़्ज़त-ए-दर्द मिली इशरत-ए-एहसास मिली
कौन कहता है हम उस बज़्म से नाकाम आए
वो भी क्या दिन थे कि इक क़तरा-ए-मय भी न मिला
आज आए तो कई बार कई जाम आए
इक हसीं याद से वाबस्ता हैं लाखों यादें
अश्क उमँड आते हैं जब लब पे तिरा नाम आए
सी लिए होंट मगर दिल में ख़लिश रहती है
इस ख़मोशी का कहीं उन पे न इल्ज़ाम आए
चंद दीवानों से रौशन थी गली उल्फ़त की
वर्ना फ़ानूस तो लाखों ही सर-ए-बाम आए
ये भी बदले हुए हालात का परतव है कि वो
ख़ल्वत-ए-ख़ास से ता जल्वा-गह-ए-आम आए
हो के मायूस मैं पैमाना भी जब तोड़ चुका
चश्म-ए-साक़ी से पिया पे कई पैग़ाम आए
शहर में पहले से बदनाम थे यूँ भी 'ज़ैदी'
हो के मय-ख़ाने से कुछ और भी बदनाम आए
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आज तिरे सवाल पर फिर मिरे लब ख़मोश हैं
ऐसी ही कशमकश थी कुछ पहली नज़र के बा'द भी
दिल में थे लाख वसवसे जल्वा-ए-आफ़्ताब तक
रह गई थी जो तीरगी नूर-ए-सहर के बा'द भी
नासेह-ए-मस्लहत-नवाज़ तुझ को बताऊँ क्या ये राज़
हौसला-ए-निगाह है ख़ून-ए-जिगर के बा'द भी
हार के भी नहीं मिटी दिल से ख़लिश हयात की
कितने निज़ाम मिट गए जश्न-ए-ज़फ़र के बा'द भी
कोई मिरा ही आशियाँ हासिल-ए-फ़स्ल-ए-गुल न था
हाँ ये बहार है बहार रक़्स-ए-शरर के बा'द भी
एक तुम्हारी याद ने लाख दिए जलाए हैं
आमद-ए-शब के क़ब्ल भी ख़त्म-ए-सहर के बा'द भी
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अगर ये कशमकश बाक़ी रही जहल ओ तमद्दुन की
ज़माना छीन लेगा दौलत-ए-इल्म-ओ-यक़ीं मुझ से
तुम्हीं से क्या छुपाना है तुम्हारी ही तो बातें हैं
जो कहती है तमन्ना की निगाह-ए-वापसीं मुझ से
निगाहें चार होते ही भला क्या हश्र उठ जाता
यक़ीनन इस से पहले भी मिले हैं वो कहीं मुझ से
दिखा दी मैं ने वो मंज़िल जो इन दोनों के आगे है
परेशाँ हैं कि आख़िर अब कहें क्या कुफ़्र ओ दीं मुझ से
ये माना ज़र्रा-ए-आवारा-ए-दश्त-ए-वफ़ा हूँ मैं
निभाना ही पड़ेगा तुझ को दुनिया-ए-हसीं मुझ से
सर-ए-मंज़िल पहुँच कर आज ये महसूस होता है
कि लाखों लग़्ज़िशें हर गाम पर होती रहीं मुझ से
उधर सारी तमन्नाओं का मरकज़ आस्ताँ उन का
इधर बरहम तमन्ना पर मिरी सरकश जबीं मुझ से
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ऐश ही ऐश है न सब ग़म है
ज़िंदगी इक हसीन संगम है
ज़िंदगी इक हसीन संगम है
जाम में है जो मिशअल-ए-गुल-रंग
तेरी आँखों का अक्स-ए-मुबहम है
ऐ ग़म-ए-दहर के गिरफ़्तारो
ऐश भी सरनविश्त-ए-आदम है
नोक-ए-मिज़्गाँ पे याद का आँसू
मौसम-ए-गुल की सर्द शबनम है
दर्द-ए-दिल में कमी हुई है कहीं
तुम ने पूछा तो कह दिया कम है
मिटती जाती है बनती जाती है
ज़िंदगी का अजीब आलम है
इक ज़रा मुस्कुरा के भी देखें
ग़म तो ये रोज़ रोज़ का ग़म है
पूछने वाले शुक्रिया तेरा
दर्द तो अब भी है मगर कम है
कह रहा था मैं अपना अफ़्साना
क्यूँ तिरा दामन-ए-मिज़ा नम है
ग़म की तारीकियों में ऐ 'ज़ैदी'
रौशनी वो भी है जो मद्धम है
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रफ़्ता रफ़्ता हर तमाशा आँसुओं में ढल गया
जाने क्या आँखों ने देखा और क्या मंज़िल में था
दास्तान-ए-ग़म से लाखों दास्तानें बन गई
फिर भी वो इक राज़-ए-सर-बस्ता रहा जो दिल में था
चश्म-ए-साक़ी के अलावा जाम-ए-ख़ाली के सिवा
कौन अपना आश्ना अग़्यार की महफ़िल में था
मेरे अरमानों का मरकज़ मेरे दर्दों का इलाज
टिमटिमाता सा दिया इक गोशा-ए-मंज़िल में था
गुफ़्तुगू के ख़त्म हो जाने पर आया ये ख़याल
जो ज़बाँ तक आ नहीं पाया वही तो दिल में था
मिट गईं इमरोज़ ओ फ़र्दा की हज़ारों उलझनें
जो सुकूँ तूफ़ाँ में पाया है वो कब साहिल में था
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