Ali Jawwad Zaidi

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Ali Jawwad Zaidi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ali Jawwad Zaidi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

जिन हौसलों से मेरा जुनूँ मुतमइन न था वो हौसले ज़माने के मेआ'र हो गए — Ali Jawwad Zaidi

Ghazal

ख़ला-ए-फ़िक्र का एहसास अर्ज़-ए-फ़न से मिला बरहनगी में नया लुत्फ़ पैरहन से मिला क़दम क़दम पे उगे ज़ख़्म-ए-आरज़ू भी हज़ार हज़ार रंग-ए-तमाशा भी इस चमन से मिला बढ़ा के हाथ कहीं उलझनें ही छीन न लें वो जाम भी जो मुझे शाम-ए-अंजुमन से मिला सहर को बे-खिली कलियों में ढूँढती है किरन जो लुत्फ़-ए-जल्वा लजाई हुई दुल्हन से मिला उसी के सोग में बैठा हुआ हूँ मुद्दत से जो एक ज़ख़्म रफ़ीक़ान-ए-हम-वतन से मिला गुरूर-ए-ख़ुश-नज़री नाज़िश-ए-अक़ीदा-ओ-रंग हज़ार रोग उसी ज़ोम-ए-मा-ओ-मन से मिला हुजूम-ए-यास में तहज़ीब-ए-नफ़्स का आहंग तिरी ही नर्म-ख़िरामी के बाँकपन से मिला वो हौसला जो नई राह की तलाश में है गली गली में भटकती हुई किरन से मिला हर एक हाल में जीने का जगमगाने का शौक़ अँधेरी शब में सितारों की अंजुमन से मिला इशारा फ़िक्र को महमेज़ हश्र-परवर का ख़ता मुआ'फ़ हो तेरे ही बाँकपन से मिला अब इस शुऊ'र को महसूर-ए-ज़ात कैसे करूँँ शुऊ'र ज़ात कि 'ज़ैदी' बड़े जतन से मिला — Ali Jawwad Zaidi
कम-ज़र्फ़ एहतियात की मंज़िल से आए हैं हम ज़िंदगी के जादा-ए-मुश्किल से आए हैं गिर्दाब महव-ए-रक़्स है तूफ़ान महव-ए-जोश कुछ लोग शौक़-ए-मौज में साहिल से आए हैं ये वज़-ए-ज़ब्त-ए-शौक़ कि दिल जल बुझा मगर शिकवे ज़बाँ पे आज भी मुश्किल से आए हैं आँखों का सोज़ दिल की कसक तो नईं मिली माना कि आप भी उसी महफ़िल से आए हैं ये क़श्क़ा-ए-ख़ुलूस है ज़ख़्म-ए-जबीं नहीं हर चंद हम भी कूचा-ए-क़ातिल से आए हैं दिल का लहू निगाह से टपका है बार-हा हम राह-ए-ग़म में ऐसी भी मंज़िल से आए हैं दिल इक उदास सुब्ह नज़र इक उदास शाम कैसे कहें कि दोस्त की महफ़िल से आए हैं छेड़ा था नोक-ए-ख़ार ने लेकिन गुमाँ हुआ ताज़ा पयाम पर्दा-ए-महमिल से आए हैं हाँ गाए जा मुग़न्नी-ए-बज़्म-ए-तरब कि आज नग़्में तिरी ज़बाँ पे मिरे दिल से आए हैं — Ali Jawwad Zaidi
जवानी हरीफ़-ए-सितम है तो क्या ग़म तग़य्युर ही अगला क़दम है तो क्या ग़म हर इक शय है फ़ानी तो ये ग़म भी फ़ानी मिरी आँख गर आज नम है तो क्या ग़म मिरे हाथ सुलझा ही लेंगे किसी दिन अभी ज़ुल्फ़-ए-हस्ती में ख़म है तो क्या ग़म ख़ुशी कुछ तिरे ही लिए तो नहीं है अगर हक़ मिरा आज कम है तो क्या ग़म मिरे ख़ूँ पसीने से गुलशन बनेंगे तिरे बस में अब्र-ए-करम है तो क्या ग़म मिरा कारवाँ बढ़ रहा है बढ़ेगा अगर रुख़ पे गर्द-ए-अलम है तो क्या ग़म ये माना कि रहबर नहीं है मिसाली मगर अपने सीने में दम है तो क्या ग़म मिरा कारवाँ आप रहबर है अपना ये शीराज़ा जब तक बहम है तो क्या ग़म तिरे पास तबल ओ अलम हैं तो होंगे मिरे पास ज़ोर-ए-क़लम है तो क्या ग़म — Ali Jawwad Zaidi
गुलों की चाह में तौहीन-ए-बर्ग-ओ-बार न कर भरे चमन में ये सामान-ए-इंतिशार न कर ख़िज़ाँ रियाज़-ए-चमन है ख़िज़ाँ गुदाज़-ए-चमन ख़िज़ाँ का डर हो तो फिर ख़्वाहिश-ए-बहार न कर बस एक दिल है यहाँ वाक़िफ़-ए-नशेब-ओ-फ़राज़ वफ़ा की राह में रहबर का इंतिज़ार न कर हुजूम-ए-ग़म में तबस्सुम का खेल देख लिया मैं कह रहा था मिरे ग़म का ए'तिबार न कर कहा ये इश्क़ से दार-ओ-सलीब-ए-ज़िंदाँ ने मजाल हो तो मिरी राह इख़्तियार न कर ये ताज़ा ताज़ा क़फ़स क्या ख़िज़ाँ से कुछ कम हैं हुजूम-ए-गुल ही से अंदाज़ा-ए-बहार न कर नसीम-ए-सुब्ह उन्हें मुस्कुरा तो लेने दे अभी गुलों से कोई ज़िक्र-ए-नागवार न कर उधर हर एक नज़र में है हसरतों का जुलूस इधर ये हुक्म-ए-हया है निगाहें चार न कर ये पूछना है किसी दिन जनाब-ए-'ज़ैदी' से कि आप ने तो कहा था किसी से प्यार न कर — Ali Jawwad Zaidi
ज़ुल्मत-कदों में कल जो शुआ-ए-सहर गई तारीकी-ए-हयात यकायक उभर गई नज़्ज़ारा-ए-जमाल की फ़ुर्सत कहाँ मिली पहली नज़र नज़र की हदों से गुज़र गई इज़हार-ए-इल्तिफ़ात के बा'द उन की बे-रुख़ी इक रंग और नक़्श-ए-तमन्ना में भर गई ज़ौक़-ए-जुनूँ ओ जज़्बा-ए-बेबाक क्या मिले वीरान हो के भी मिरी दुनिया सँवर गई अब दौर-ए-कारसाज़ी-ए-वहशत नहीं रहा अब आरज़ू-ए-लज्ज़त-ए-रक़्स-ए-शरर गई इक दाग़ भी जबीं पे मेरी आ गया तो क्या शोख़ी तो उन के नक़्श-ए-क़दम की उभर गई तारे से झिलमिलाते हैं मिज़्गान-ए-यार पर शायद निगाह-ए-यास भी कुछ काम कर गई तुम ने तो इक करम ही किया हाल पूछ कर अब जो गुज़र गई मिरे दिल पर गुज़र गई जल्वे हुए जो आम तो ताब-ए-नज़र न थी पर्दे पड़े हुए थे जहाँ तक नज़र गई सारा क़ुसूर उस निगह-ए-फ़ित्ना-जू का था लेकिन बला निगाह-ए-तमन्ना के सर गई — Ali Jawwad Zaidi
शिकवे हम अपनी ज़बाँ पर कभी लाए तो नहीं हाँ मगर अश्क जब उमडे थे छुपाए तो नहीं तेरी महफ़िल के भी आदाब कि दिल डरता है मेरी आँखों ने दुर्र-ए-अश्क लुटाए तो नहीं छान ली ख़ाक बयाबानों की वीरानों की फिर भी अंदाज़-ए-जुनूँ अक़्ल ने पाए तो नहीं लाख पुर-वहशत ओ पुर-हौल सही शाम-ए-फ़िराक़ हम ने घबरा के दिए दिन से जलाए तो नहीं अब तो इस बात पे भी सुल्ह सी कर ली है कि वो न बुलाए न सही दिल से भुलाए तो नहीं हिज्र की रात ये हर डूबते तारे ने कहा हम न कहते थे न आएँगे वो आए तो नहीं इंक़िलाब आते हैं रहते हैं जहाँ में लेकिन जो बनाने का न हो अहल मिटाए तो नहीं अपनी इस शोख़ी-ए-रफ़्तार का अंजाम न सोच फ़ित्ने ख़ुद उठने लगे तू ने उठाए तो नहीं — Ali Jawwad Zaidi
हुजूम-ए-ऐश-ओ-तरब में भी है बशर तन्हा नफ़स नफ़स है मुहाजिर नज़र नज़र तन्हा ये मेरा अक्स है आईने में कि दुश्मन है उदास तिश्ना-सितम दीदा-ए-बे-ख़बर तन्हा ये क़त्ल-गाह भी है बाल-पन का आँगन भी भटक रही है जहाँ चश्म-ए-मो'तबर तन्हा बुरा न मान मिरे हम-सफ़र ख़ुदा के लिए चलूँगा मैं भी इसी राह पर मगर तन्हा न जाने भीगी हैं पलकें ये क्यूँँ दम-ए-रुख़्सत कि घर में भी तो रहा हूँ मैं उम्र-भर तन्हा न बज़्म-ए-ख़लवतियाँ है न हश्र-गाह-ए-अवाम अँधेरी रात करूँँ किस तरह बसर तन्हा किसी ग़ज़ल का कोई शे'र गुनगुनाते चलें तवील राहें वफ़ा की हैं और सफ़र तन्हा निसार कर दूँ ये पलकों पे काँपती यादें तिरा ख़याल जो आए दम-ए-सहर तन्हा जिधर भी जाओ कोई राह रोक लेता है वफ़ा ने छोड़ी नहीं एक भी डगर तन्हा बरत लो यारो बरतने की चीज़ है ये हयात हो लाख तरसी हुई तल्ख़-ए-मुख़्तसर तन्हा उमीद कितनी ही मायूसियों की मशअ'ल है हो रहगुज़ार में जैसे कोई शजर तन्हा जिधर से गुज़रे थे मा'सूम हसरतों के जुलूस सुना कि आज है 'ज़ैदी' वही डगर तन्हा — Ali Jawwad Zaidi
तिरे दयार में कोई ग़म-आश्ना तो नहीं मगर वहाँ के सिवा और रास्ता तो नहीं सिमट के आ गई दुनिया क़रीब-ए-मय-ख़ाना कोई बताओ यही ख़ाना-ए-ख़ुदा तो नहीं लबों पर आज तबस्सुम की मौज मचली है कोई मुझे किसी गोशे से देखता तो नहीं बना लें राह इसी ख़ार-ज़ार से हो कर जुनून-ए-शौक़ का ये फ़ैसला बुरा तो नहीं सबब हो कुछ भी तिरे इंफ़िआल का लेकिन मिरी शिकस्त से पहले कभी हुआ तो नहीं न रेग-ए-गर्म न काँटे न राहज़न न ग़नीम ये रास्ता कहीं ग़ैरों का रास्ता तो नहीं दयार-ए-सज्दा में तक़लीद का रिवाज भी है जहाँ झुकी है जबीं उन का नक़्श-ए-पा तो नहीं ख़याल-ए-साहिल ओ फ़िक्र-ए-तबाह-कारी-ए-मौज ये सब है फिर भी तमन्ना-ए-नाख़ुदा तो नहीं — Ali Jawwad Zaidi
ऐश ही ऐश है न सब ग़म है ज़िंदगी इक हसीन संगम है जाम में है जो मिशअल-ए-गुल-रंग तेरी आँखों का अक्स-ए-मुबहम है ऐ ग़म-ए-दहर के गिरफ़्तारो ऐश भी सरनविश्त-ए-आदम है नोक-ए-मिज़्गाँ पे याद का आँसू मौसम-ए-गुल की सर्द शबनम है दर्द-ए-दिल में कमी हुई है कहीं तुम ने पूछा तो कह दिया कम है मिटती जाती है बनती जाती है ज़िंदगी का अजीब आलम है इक ज़रा मुस्कुरा के भी देखें ग़म तो ये रोज़ रोज़ का ग़म है पूछने वाले शुक्रिया तेरा दर्द तो अब भी है मगर कम है कह रहा था मैं अपना अफ़्साना क्यूँँ तिरा दामन-ए-मिज़ा नम है ग़म की तारीकियों में ऐ 'ज़ैदी' रौशनी वो भी है जो मद्धम है — Ali Jawwad Zaidi
मस्ती-ए-गाम भी थी ग़फ़लत-ए-अंजाम के साथ दो घड़ी खेल लिए गर्दिश-ए-अय्याम के साथ तिश्ना-लब रहने पे भी साख तो थी शान तो थी वज़-ए-रिंदाना गई इक तलब-ए-जाम के साथ जब से हंगाम-ए-सफ़र अश्कों के तारे चमके तल्ख़ियाँ हो गईं वाबस्ता हर इक शाम के साथ अब न वो शोरिश-ए-रफ़्तार न वो जोश-ए-जुनूँ हम कहाँ फँस गए यारान-ए-सुबुक-गाम के साथ उड़ चुकी हैं सितम-आराओं की नींदें अक्सर आप सुनिए कभी अफ़्साना ये आराम के साथ इस में साक़ी का भी दर-पर्दा इशारा तो नहीं आज कुछ रिंद भी थे वाइज़-ए-बदनाम के साथ ग़ैर की तरह मिले अहल-ए-हरम ऐ 'ज़ैदी' मुझ को यक-गो न अक़ीदत जो थी असनाम के साथ — Ali Jawwad Zaidi
हम-सफ़र गुम रास्ते ना-पैद घबराता हूँ मैं इक बयाबाँ दर बयाबाँ है जिधर जाता हूँ मैं बज़्म-ए-फ़िक्र ओ होश हो या महफ़िल-ए-ऐश ओ नशात हर जगह से चंद निश्तर चंद ग़म लाता हूँ मैं आ गई ऐ ना-मुरादी वो भी मंज़िल आ गई मुझ को क्या समझाएँगे वो उन को समझाता हूँ मैं उन के लब पर है जो हल्के से तबस्सुम की झलक उस में अपने आँसुओं का सोज़ भी पाता हूँ मैं शाम-ए-तन्हाई बुझा दे झिलमिलाती शम्अ' भी इन अँधेरों में ही अक्सर रौशनी पाता हूँ मैं हिम्मत-अफ़ज़ा है हर इक उफ़्ताद राह-ए-शौक़ की ठोकरें खाता हूँ गिरता हूँ सँभल जाता हूँ मैं उन के दामन तक ख़ुद अपना हाथ भी बढ़ता नहीं अपना दामन हो तो हर काँटे से उलझाता हूँ मैं शौक़-ए-मंज़िल हम-सफ़र है जज़्बा-ए-दिल राहबर मुझ पे ख़ुद भी खुल नहीं पाता किधर जाता हूँ मैं — Ali Jawwad Zaidi
जुनूँ से राह-ए-ख़िरद में भी काम लेना था हर एक ख़ार से इज़्न-ए-ख़िराम लेना था फ़राज़-ए-दार पे दामन किसी का थाम लिया जुनून-ए-शौक़ को भी इंतिक़ाम लेना था हज़ार बार नताएज से हो के बे-परवा उसी का नाम लिया जिस का नाम लेना था इलाज-ए-तिश्ना-लबी सहल था मगर साक़ी जो दस्त-ए-ग़ैर में है कब वो जाम लेना था जुनूँ की राह में तदबीर-ए-सर ख़ुशी के लिए बस एक वलवला-ए-तेज़-गाम लेना था शिकस्ता लाख थी कश्ती हज़ार था तूफ़ाँ ख़याल में कोई दामन तो थाम लेना था नसीम एक रविश तक पहुँच के थम सी गई कि ना-शगुफ़्ता कली का पयाम लेना था शब-ए-फ़िराक़ में भी कुछ दिए चमकने लगें निगाह-ए-शौक़ से इतना तो काम लेना था हज़ार बार तिरी बज़्म में हुआ महसूस लिया जो ग़ैर ने मुझ को वो जाम लेना था मैं एक जुरअ-ए-मस्ती पे सुल्ह क्यूँँ करता मुझे तो जाम में माह-ए-तमाम लेना था ग़ज़ब हुआ कि इन आँखों में अश्क भर आए निगाह-ए-यास से कुछ और काम लेना था किसी ने आग लगाई हो कोई मुजरिम हो हमें तो अपने ही सर इत्तिहाम लेना था निगाह-ए-शोख़ यही फ़त्ह और कुछ होती जो गिर रहे थे उन्हें बढ़ के थाम लेना था ये बज़्म-ए-ख़ास का ऐश-ए-दो-रोज़ा क्या होगा ग़म-ए-अवाम से ऐश-ए-दवाम लेना था — Ali Jawwad Zaidi
ज़र्रा-ए-ना-तापीदा की ख़्वाहिश-ए-आफ़ताब क्या नग़्मा-ए-ना-शुनीदा का हौसला-ए-रबाब क्या उम्र का दिल है मुज़्महिल ज़ीस्त है दर्द-ए-मुस्तक़िल ऐसे निज़ाम-ए-दहर में वसवसा-ए-अज़ाब क्या नग़्मा ब-लब हैं कियारियाँ रक़्स में ज़र्रा-ए-तपाँ सुन लिया किश्त-ए-ख़ुश्क ने ज़मज़मा-ए-सहाब क्या चेहरा-ए-शब दमक उठा सुर्ख़ शफ़क़ झलक उठी वक़्त-ए-तुलू कह गया जाने आफ़्ताब क्या रिंदों से बाज़-पुर्स की पीर-ए-मुग़ाँ से दिल-लगी आज ये मोहतसिब ने भी पी है कहीं शराब क्या शम्अ' थी लाख अध-जली बज़्म में रौशनी तो थी वर्ना ग़म-ए-नशात में रौशनी-ए-गुलाब क्या ग़ैर की रह-गुज़र है ये दोस्त की रह-गुज़र नहीं कौन उठाएगा तुझे देख रहा है ख़्वाब क्या मुद्दतों से ख़लिश जो थी जैसे वो कम सी हो चली आज मिरे सवाल का मिल ही गया जवाब क्या हाँ तिरी मंज़िल-ए-मुराद दूर बहुत ही दूर है फिर भी हर एक मोड़ पर दिल में ये इज़्तिराब क्या — Ali Jawwad Zaidi
ऐसी तन्हाई है अपने से भी घबराता हूँ मैं जल रही हैं याद की शमएँ बुझा जाता हूँ मैं आ गई आख़िर ग़म-ए-दिल वो भी मंज़िल आ गई मुझ को समझाते थे जो अब उन को समझाता हूँ मैं ज़िंदगी आज़ादा-रौ बहर-ए-हक़ीक़त बे-कनार मौज आती है तो बढ़ता ही चला जाता हूँ मैं बज़्म-ए-फ़िक्र-ओ-होश हो या महफ़िल-ए-ऐश-ओ-निशात हर जगह से चंद नश्तर चंद ग़म लाता हूँ मैं ज़ेहन में यादों के गुलशन दिल में अज़्म-ए-जू-ए-शीर इक नया फ़रहाद पाता हूँ जिधर जाता हूँ मैं शब के सन्नाटे में रह ग़ैरों के नग़्में की तरह अहल-ए-दिल की बस्तियों में आह बन जाता हूँ मैं हिम्मत-अफ़ज़ा है हर इक उफ़्ताद राह-ए-इश्क़ की ठोकरें खाता हूँ गिरता हूँ सँभल जाता हूँ मैं इश्क़ अक्सर माँगता है नग़्मा-ए-इशरत की भीक अहल-ए-दुनिया की तही-दस्ती पे शरमाता हूँ मैं शाम-ए-तन्हाई बुझा दो झिलमिलाती शम्अ' भी इन अँधेरों ही में अक्सर रौशनी पाता हूँ मैं आज आग़ोश-ए-तमन्ना थी शनासा-ए-विसाल रज़्म-गाह-ए-ज़िंदगी में ताज़ा-दम आता हूँ मैं कोई नाज़ुक हाथ बाज़ू थाम लेता है मिरा ठोकरें खाता तो हूँ लेकिन सँभल जाता हूँ मैं अपने मिटने का भी ग़म होता है इस एहसास से मैं नहीं अपना मगर तेरा तो कहलाता हूँ मैं है सुहानी किस क़दर उन दूरियों की चाँदनी पूछ लेता है कोई 'ज़ैदी' तो इतराता हूँ मैं — Ali Jawwad Zaidi
है ख़मोश आँसुओं में भी नशात-ए-कामरानी कोई सुन रहा है शायद मिरी दुख भरी कहानी यही थरथराते आँसू यही नीची नीची नज़रें यही उन की भी निशानी यही अपनी भी निशानी ये निज़ाम-ए-बज़्म-ए-साक़ी कहीं रह सकेगा बाक़ी कि ख़ुशी तो चंद लम्हे ग़म ओ दर्द जावेदानी हैं वजूद-ए-शय में पिन्हाँ अज़ल ओ अबद के रिश्ते यहाँ कुछ नहीं दो रोज़ा कोई शय नहीं है फ़ानी तिरी बात क्या है वाइज़ मिरा दिल वो है कि जिस ने इसी मय-कदे में अक्सर मिरी बात भी न मानी पय-ए-रफ़-ए-बद-गुमानी मैं वफ़ा बरत रहा था मिरी पय-ब-पय वफ़ा से बढ़ी और बद-गुमानी मिरा मय-कदा सलामत कि हर एक क़ैद उठा दी न तो दैर की ग़ुलामी न हरम की पासबानी करूँँ उन से लाख शिकवे मगर उन से शिकवा करना न तरीक़ा-ए-मोहब्बत न रिवायत-ए-जवानी — Ali Jawwad Zaidi
है वही मार्का-ए-नेकी-ओ-शर मेरे बा'द थम न जाएँ कहीं यारान-ए-सफ़र मेरे बा'द कम हैं ऐसे जो करें अर्ज़-ए-हुनर मेरे बा'द आज ग़मनाक से हैं अहल-ए-नज़र मेरे बा'द चंद साअ'त के लिए रुक भी गया रो भी लिया कारवाँ फिर भी है सरगर्म-ए-सफ़र मेरे बा'द जज़्ब थीं जिस में मिरे ख़ून-ए-वफ़ा की छींटें बन गया सज्दा-गह-ए-ख़ल्क़ वो दर मेरे बा'द हिज्र की रात लरज़ता ही रहा पलकों पर क़तरा-ए-अश्क बना नज्म-ए-सहर मेरे बा'द शायद ऐ दोस्त तमाशाओं के हंगामों में याद आए मिरी मोहतात नज़र मेरे बा'द आज अंजान बनो भूल भी जाओ लेकिन क्या करोगे मिरी याद आए अगर मेरे बा'द क्यूँँ बिछाते हो मिरी राह में काँटे यारो ख़ैर जारी से बदल जाएगा शर मेरे बा'द अब भी शोर-ए-क़दम-ए-राह-रवाँ है तो वही फिर भी सूनी है तिरी राह-गुज़र मेरे बा'द क्या कोई और बनाता था नशेमन अपना फिर उसी शाख़ पे है रक़्स-ए-शरर मेरे बा'द इक मिरी याद की मशअ'ल के सिवा कुछ भी न हो रात इस तरह से भी होगी बसर मेरे बा'द ये तमव्वुज ये तलातुम ये शहादत ये शुहूद ख़त्म है मंज़िल-ए-अव्वल का सफ़र मेरे बा'द अश्क आँखों में भरे उस ने भी देखा 'ज़ैदी' आज महफ़िल को ब-अंदाज़-ए-दिगर मेरे बा'द — Ali Jawwad Zaidi
बरहम-ज़न-ए-शीराज़ा-ए-अय्याम हमीं हैं ऐ दर्द-ए-मोहब्बत तिरा अंजाम हमीं हैं इस क़ाफ़िला-ए-शौक़ में ये वहम है सब को आवारा-ओ-सरगश्ता-ओ-नाकाम हमीं हैं होंगे कई गर्दन-ज़दनी और भी लेकिन इस शहर-ए-निगाराँ में तो बदनाम हमीं हैं हम धूप में तपते तो पनप जाते मगर अब दरयूज़ा-गर-ए-मेहर-ए-लब-ए-बाम हमीं हैं क्या आन थी नाकामी-ए-तदबीर से पहले अब लाएक़‌‌‌‌-ए-फ़हमाइश-ए-दुश्नाम हमीं हैं हक़ नक़्द-ए-मसर्रत का अगर है तो हमीं को कुछ नब्ज़-शनास-ए-ग़म-ओ-आलाम हमीं हैं जिस तक कोई कोई अभी पहुँचा ही नहीं है वो मशअल-ए-बे-नूर सर-ए-शाम हमीं हैं इनकार ही सर-चश्मा-ए-ईमान-ओ-यकीं है अब रोज़-ए-जज़ा लाएक़-ए-इनआ'म हमीं हैं कलियों से दम-ए-सुब्ह जो 'ज़ैदी' ने सुना था फ़ितरत का वो ना-गुफ़्ता सा पैग़ाम हमीं हैं — Ali Jawwad Zaidi
तेरे हल्के से तबस्सुम का इशारा भी तो हो ता सर-ए-दार पहुँचने का सहारा भी तो हो शिकवा ओ तंज़ से भी काम निकल जाते हैं ग़ैरत-ए-इश्क़ को लेकिन ये गवारा भी तो हो मय-कशों में न सही तिश्ना-लबों में ही सही कोई गोशा तिरी महफ़िल में हमारा भी तो हो किस तरफ़ मोड़ दें टूटी हुई कश्ती अपनी ऐसे तूफ़ाँ में कहीं कोई किनारा भी तो हो है ग़म-ए-इश्क़ में इक लज़्ज़त-ए-जावेद मगर इस ग़म-ए-दहरस ऐ दिल कोई चारा भी तो हो मय-कदे भर पे तिरा हक़ है मगर पीर-ए-मुग़ाँ इक किसी चीज़ पे रिंदों का इजारा भी तो हो अश्क-ए-ख़ूनीं से जो सींचे थे बयाबाँ हम ने उन में अब लाला ओ नस्रीं का नज़ारा भी तो हो जाम उबल पड़ते हैं मय लुटती है ख़ुम टूटते हैं निगह-ए-नाज़ का दर-पर्दा इशारा भी तो हो पी तो लूँ आँखों में उमडे हुए आँसू लेकिन दिल पे क़ाबू भी तो हो ज़ब्त का यारा भी तो हो आप इस वादी-ए-वीराँ में कहाँ आ पहुँचे मैं गुनहगार मगर मैं ने पुकारा भी तो हो — Ali Jawwad Zaidi
अहल-ए-ज़ाहिर को फ़न्न-ए-जल्वा-गरी ने मारा अहल-ए-बातिन को तवाना-नज़री ने मारा तल्ख़ थी मौत मगर ज़ीस्त से शीरीं-तर थी उस से पूछो जिसे बे-बाल-ओ-परी ने मारा मुंदमिल होते हुए ज़ख़्म हरे होने लगे साए साए में तिरी हम-सफ़री ने मारा दश्त-ए-ग़ुर्बत के शब-ओ-रोज़ की लज़्ज़त न मिली सर वतन में भी बहुत दर-ब-दरी ने मारा इश्क़ और दस्त-ए-तलब ऐसी भी क्या मजबूरी शौक़ को काविश-ए-दरयूज़ा-गरी ने मारा ज़ख़्म-ए-पारीना भरा ही था कि ऐ सोज़न-ए-हाल और इक तीर तिरी बख़िया-गरी ने मारा दाद-ओ-शमशीर ने जब जब भी डराना चाहा क़हक़हा शौक़ की शोरीदा-सरी ने मारा सुल्ह करना तो ज़माने से है आसाँ लेकिन मुझ को 'ज़ैदी' मिरी बालिग़-नज़री ने मारा — Ali Jawwad Zaidi