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जल्वों की अना तोड़ गई एक ही पल में
कचनार सी बिजली मेरे सीने में उड़ी थी
पीता रहा दरिया के तमव्वुज को शनावर
होंटों पे नदी के भी अजब तिश्ना-लबी थी
ख़ुश-रंग मआ'नी के तआक़ुब में रहा मैं
ख़त्त-ए-लब-ए-लालीं की हर इक मौज ख़फ़ी थी
हर सम्त रम-ए-हफ़्त बला शोला-फ़िशाँ है
बचपन में तो हर गाम पे इक सब्ज़-परी थी
सदियों से है जलते हुए टापू की अमानत
वो वादी-ए-गुल-रंग जो ख़्वाबों में पली थी
जलते हुए कोहसार पे इक शोख़ गिलहरी
मुँह मोड़ के गुलशन से ब-सद नाज़ खड़ी थी
नेज़े की अनी थी रग-ए-अनफ़ास में रक़्साँ
वो ताज़ा हवाओं में था खिड़की भी खुली थी
हम पी भी गए और सलामत भी हैं 'अंबर'
पानी की हर इक बूँद में हीरे की कनी थी
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मैं अपनी वुसअतों को उस गली में भूल जाता हूँ
न जाने कौन से जादू के हाथों में खिलौना हूँ
न जाने कौन से जादू के हाथों में खिलौना हूँ
सफ़र ये पानियों का जब मुझे बे-आब करता है
मैं दरिया की रुपहली रेत को बिस्तर बनाता हूँ
सवालों के कई पत्थर उठाए लोग बैठे हैं
मैं अपना नन्हा बच्चा क़ब्र में दफ़ना के लौटा हूँ
न जाने किस फ़ज़ा में खो गया वो दूधिया आँचल
कि जिस के फ़ैज़ से मैं कितनी आँखों का उजाला हूँ
वो सूरज मेरे चारों सम्त है फैला हुआ लेकिन
मैं अक्सर अजनबी धुँदलाहटों में डूब जाता हूँ
लिपट जाती है मेरी उँगलियों से ख़ुद शफ़क़ आ कर
सहर की सम्त जब मैं अपने हाथों को बढ़ाता हूँ
कोई तो है कि जो मुझ को उजाले बख़्श जाता है
ब-ज़ाहिर मैं किसी तारीक टापू में अकेला हूँ
मिरे सीने में 'अंबर' इक धनक सी फैल जाती है
मैं अपने आँसुओं की चाँदनी में शे'र लिखता हूँ
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चाँदनी के शहर में हमराह था वो भी मगर
दूर तक ख़ामोशियों के साज़ थे बजते हुए
हँस रहा था वो हरी रुत की सुहानी छाँव में
दफ़अ'तन हर इक शजर के पैरहन मैले हुए
आज इक मासूम बच्ची की ज़बाँ खींची गई
मेरी बस्ती में अंधेरे और भी गहरे हुए
हर गली में थीं सियह परछाइयों की यूरिशें
शब कई गूँगे मलक हर छत पे थे बैठे हुए
सब अदाएँ वक़्त की वो जानता है इस लिए
टाट के नीचे सुनहरा ताज है रक्खे हुए
सूप के दाने कबूतर चुग रहा था और वो सहन को महका रही थी सुन्नतें पढ़ते हुए
रात 'अंबर' कहकशाँ से दूब ये कहने लगी
छाँव में मेरी हज़ारों चाँद हैं सोए हुए
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जलते हुए जंगल से गुज़रना था हमें भी
फिर बर्फ़ के सहरा में ठहरना था हमें भी
फिर बर्फ़ के सहरा में ठहरना था हमें भी
में'आर-नावाज़ी में कहाँ उस को सुकूँ था
उस शोख़ की नज़रों से उतरना था हमें भी
जाँ बख़्श था पल भर के लिए लम्स किसी का
फिर कर्ब के दरिया में उतरना था हमें भी
यारों की नज़र ही में न थे पँख हमारे
ख़ुद अपनी उड़ानों को कतरना था हमें भी
वो शहद में डूबा हुआ लहजा वो तख़ातुब
इख़्लास के वो रंग कि डरना था हमें भी
याद आए जो क़द्रों के महकते हुए गुलबन
चाँदी के हिसारों से उभरना था हमें भी
सोने के हंडोले में वो ख़ुश-पोश मगन था
मौसम भी सुहाना था सँवरना था हमें भी
हर फूल पे उस शख़्स को पत्थर थे चलाने
अश्कों से हर इक बर्ग को भरना था हमें भी
उस को था बहुत नाज़ ख़द्द-ओ-ख़ाल पे 'अंबर'
इक रोज़ तह-ए-ख़ाक बिखरना था हमें भी
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चेहरों पे ज़र-पोश अंधेरे फैले हैं
अब जीने के ढंग बड़े ही महँगे हैं
अब जीने के ढंग बड़े ही महँगे हैं
हाथों में सूरज ले कर क्यूँ फिरते हैं
इस बस्ती में अब दीदा-वर कितने हैं
क़द्रों की शब-रेज़ी पर हैरानी क्यूँ
ज़ेहनों में अब काले सूरज पलते हैं
हर भरे जंगल कट कर अब शहर हुए
बंजारे की आँखों में सन्नाटे हैं
फूलों वाले टापू तो ग़र्क़ाब हुए
आग अगले नए जज़ीरे उभरे हैं
उस के बोसीदा-कपड़ों पर मत जाओ
मस्त क़लंदर की झोली में हीरे हैं
ज़िक्र करो हो मुझ से क्या तुग़्यानी का
साहिल पर ही अपने रेन बसेरे हैं
इस वादी का तो दस्तूर निराला है
फूल सरों पर कंकर पत्थर ढोते हैं
'अंबर' लाख सवा पंखी मौसम आएँ
वोलों की ज़द में अनमोल परिंदे हैं
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दरवाज़ा वा कर के रोज़ निकलता था
सिर्फ़ वही अपने घर का सरमाया था
सिर्फ़ वही अपने घर का सरमाया था
खड़े हुए थे पेड़ जड़ों से कट कर भी
तेज़ हवा का झोंका आने वाला था
उसी नदी में उस के बच्चे डूब गए
उसी नदी का पानी उस का पीना था
सब्ज़ क़बाएँ रोज़ लुटाता था लेकिन
ख़ुद उस के तन पर बोसीदा कपड़ा था
बाहर सारे मैदाँ जीत चुका था वो
घर लौटा तो पल भर में ही टूटा था
बुत की क़ीमत आँक रहा था वैसे वो
मंदिर में तो पूजा करने आया था
चीख़ पड़ीं सारी दीवारें 'अंबर'-जी
मैं सब से छुप कर कमरे में बैठा था
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पीस रहा है दिल को इक वज़नी पत्थर
दूब को बाँहों में भर कर मैं हँसता हूँ
तेरे हाथों ने मुझ में सब रंग भरे
लेकिन हर पल ये एहसास अधूरा हूँ
धूप कभी चमकेगी इस उम्मीद पे मैं
बर्फ़ के दरिया में सदियों से लेटा हूँ
इस जानिब कब ऊदे बादल ने देखा
फिर भी मैं तन्हा सरसब्ज़ जज़ीरा हूँ
मेरा कर्ब मिरी तन्हाई की ज़ीनत
मैं चेहरों के जंगल का सन्नाटा हूँ
इक धुँदली तस्वीर अभी आँखों में है
इस वादी से दूर भला कब रहता हूँ
रात उफ़ुक़ पर कुछ साए लहराए थे
'अंबर' अब तक आस लगाए बैठा हूँ
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नहर किनारे एक समुंदर प्यासा है
ढलते हुए सूरज का सीना चाक हुआ
इक शफ़्फ़ाफ़ तबीअत वाला सहराई
शहर में रह कर किस दर्जा चालाक हुआ
शब उजली दस्तारें क्या सर-गर्म हुईं
भोर समय सारा मंज़र नमनाक हुआ
वो तो उजालों जैसा था उस की ख़ातिर
आने वाला हर लम्हा सफ़्फ़ाक हुआ
ख़ाल-ओ-ख़द मंज़र पैकर और गुल बूटे
ख़ूब हुए मेरे हाथों में चाक हुआ
इक तालाब की लहरों से लड़ते लड़ते
वो भी काले दरिया का पैराक हुआ
मौसम ने करवट ली क्या आँधी आई
अब के तो कोहसार ख़स-ओ-ख़ाशाक हुआ
बातिन की सारी लहरें थीं जोबन पर
उस के आरिज़ का तिल भी बेबाक हुआ
चंद सुहाने मंज़र कुछ कड़वी यादें
आख़िर 'अंबर' का भी क़िस्सा पाक हुआ
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चुपके चुपके रोता है तन्हाई में
वो जो शहर के हर मेले का बानी है
नदी किनारे शहर पनाहें बालों की
सावन की बौछारें हैं तुग़्यानी है
बाहर धूप समुंदर सुर्ख़ बगूले भी
अंदर हर ख़ुलिए में रुत बर्फ़ानी है
उस ने हर ज़र्रे को तिलिस्म-आबाद किया
हाथ हमारे लगी फ़क़त हैरानी है
मेरे दश्त को शायद उस ने देख लिया
धूप शबनमी हर-सू मंज़र धानी है
जाने क्या बरसा था रात चराग़ों से
भोर समय सूरज भी पानी पानी है
उस ने हर लम्हा ख़ुद को यूँ राम किया
हर पैकर में उस की राम-कहानी है
कच्चा घर आता है याद बहुत 'अंबर'
कहने को शहरों में हर आसानी है
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