मैं अपनी वुसअतों को उस गली में भूल जाता हूँ

न जाने कौन से जादू के हाथों में खिलौना हूँ

सफ़र ये पानियों का जब मुझे बे-आब करता है
मैं दरिया की रुपहली रेत को बिस्तर बनाता हूँ

सवालों के कई पत्थर उठाए लोग बैठे हैं
मैं अपना नन्हा बच्चा क़ब्र में दफ़ना के लौटा हूँ

न जाने किस फ़ज़ा में खो गया वो दूधिया आँचल
कि जिस के फ़ैज़ से मैं कितनी आँखों का उजाला हूँ

वो सूरज मेरे चारों सम्त है फैला हुआ लेकिन
मैं अक्सर अजनबी धुँदलाहटों में डूब जाता हूँ

लिपट जाती है मेरी उँगलियों से ख़ुद शफ़क़ आ कर
सहर की सम्त जब मैं अपने हाथों को बढ़ाता हूँ

कोई तो है कि जो मुझ को उजाले बख़्श जाता है
ब-ज़ाहिर मैं किसी तारीक टापू में अकेला हूँ

मिरे सीने में 'अंबर' इक धनक सी फैल जाती है
मैं अपने आँसुओं की चाँदनी में शे'र लिखता हूँ

— Ambar Bahraichi

More by Ambar Bahraichi

Other ghazal from the same pen

See all from Ambar Bahraichi →

Aadmi Shayari

Shers of aadmi.

All Aadmi Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling