जलते हुए जंगल से गुज़रना था हमें भी

फिर बर्फ़ के सहरा में ठहरना था हमें भी

में'आर-नावाज़ी में कहाँ उस को सुकूँ था
उस शोख़ की नज़रों से उतरना था हमें भी

जाँ बख़्श था पल भर के लिए लम्स किसी का
फिर कर्ब के दरिया में उतरना था हमें भी

यारों की नज़र ही में न थे पँख हमारे
ख़ुद अपनी उड़ानों को कतरना था हमें भी

वो शहद में डूबा हुआ लहजा वो तख़ातुब
इख़्लास के वो रंग कि डरना था हमें भी

याद आए जो क़द्रों के महकते हुए गुलबन
चाँदी के हिसारों से उभरना था हमें भी

सोने के हंडोले में वो ख़ुश-पोश मगन था
मौसम भी सुहाना था सँवरना था हमें भी

हर फूल पे उस शख़्स को पत्थर थे चलाने
अश्कों से हर इक बर्ग को भरना था हमें भी

उस को था बहुत नाज़ ख़द्द-ओ-ख़ाल पे 'अंबर'
इक रोज़ तह-ए-ख़ाक बिखरना था हमें भी

— Ambar Bahraichi

More by Ambar Bahraichi

Other ghazal from the same pen

See all from Ambar Bahraichi →

Nadii Shayari

Shers of nadii.

All Nadii Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling