Akbar Ali Khan Arshi Zadah

@akbar-ali-khan-arshi-zadah

Akbar Ali Khan Arshi Zadah shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Akbar Ali Khan Arshi Zadah's shayari and don't forget to save your favorite ones.

Followers

0

Content

15

Likes

13

Shayari
Audios
  • Sher(1)
  • Ghazal(14)

Sher

जो कुछ मता-ए-हुनर हो तो सामने लाओ कि ये ज़माना-ए-इज़हार-ए-नस्ल-ओ-रंग नहीं — Akbar Ali Khan Arshi Zadah

Ghazal

आज यूँँ मुझ से मिला है कि ख़फ़ा हो जैसे उस का ये हुस्न भी कुछ मेरी ख़ता हो जैसे वही मायूसी का आलम वही नौमीदी का रंग ज़िंदगी भी किसी मुफ़्लिस की दुआ हो जैसे कभी ख़ामोशी भी यूँँ बोलती है प्यार के बोल कोई ख़ामोशी में भी नग़्मा-सरा हो जैसे हर्फ़-ए-दुश्नाम से यूँँ उस ने नवाज़ा हम को ये मलामत ही मोहब्बत का सिला हो जैसे इस तकल्लुफ़ से सितम हम पे रवा रखता है ये भी मिनजुमला-ए-आदाब-ए-वफ़ा हो जैसे ग़म-ए-अय्याम पे यूँँ ख़ुश हैं तिरे दीवाने ग़म-ए-अय्याम भी इक तेरी अदा हो जैसे बंदगी हम को तो आई कि न आई लेकिन हुस्न यूँँ रूठ गया है कि ख़ुदा हो जैसे — Akbar Ali Khan Arshi Zadah
ये शौक़ सारे यक़ीन-ओ-गुमाँ से पहले था मैं सज्दा-रेज़ नवा-ए-अज़ाँ से पहले था हैं काएनात की सब वुसअ'तें उसी की गवाह जो हर ज़मीन से हर आसमाँ से पहले था सितम है उस से कहूँ जिस्म-ओ-जाँ पे क्या गुज़री कि जिस को इल्म मिरे जिस्म-ओ-जाँ से पहले था उसी ने दी है वही एक दिन बुझाएगा प्यास जो सोज़-ए-सीना-ए-ओ-अश्क-ए-रवाँ से पहले था उसी से थी और उसी से रहेगी अपनी तलब जो आरज़ू की हर इक ईन-ओ-आँ से पहले था वो सुन रहा है मिरी बे-ज़बानियों की ज़बाँ जो हर्फ़-ओ-सौत-ओ-सदा-ओ-ज़बाँ से पहले था ये हम्द हुस्न-ए-बयाँ है मिरा कि इज्ज़-ए-सुख़न हर एक वस्फ़ जब उस का बयाँ से पहले था — Akbar Ali Khan Arshi Zadah
सज़ा है किस के लिए और जज़ा है किस के लिए पता नहीं दर-ए-ज़िंदाँ खुला है किस के लिए सुराही-ए-मय-ए-नाब-ओ-सफीना-हा-ए-ग़ज़ल ये हर्फ़-ए-हुस्न-ए-मुक़द्दर लिखा है किस के लिए फ़क़त शुनीद है अब तक जो दीद हो तो बताएँ बहार-ए-सब्ज़ा-ओ-रक़्स-ए-सबा है किस के लिए नहीं जो अपने लिए बावजूद ज़ौक़-ए-नज़र सहीफ़ा-ए-रुख़-ओ-रंग-ए-हिना है किस के लिए मिटा सके न अगर तिश्ना-कामियाँ मेरी कहो कि ख़ूबी-ए-आब-ओ-हवा है किस के लिए तुम्हें नहीं हो अगर आज गोश-बर-आवाज़ ये मेरी फ़िक्र ये मेरी नवा है किस के लिए ये इक सवाल है शिकवा नहीं गिला भी नहीं मिरे ख़ुदा तिरा लुत्फ़-ओ-अता है किस के लिए — Akbar Ali Khan Arshi Zadah
तेरा ख़याल जाँ के बराबर लगा मुझे तू मेरी ज़िंदगी है ये अक्सर लगा मुझे दरिया तिरे जमाल के हैं कितने इस में गुम सोचा तो अपना दिल भी समुंदर लगा मुझे लूटा जो उस ने मुझ को तो आबाद भी किया इक शख़्स रहज़नी में भी रहबर लगा मुझे क्या बात थी कि क़िस्सा-ए-फ़रहाद-ए-कोहकन अपनी ही दास्तान-ए-सरासर लगा मुझे आमद ने तेरी कर दिया आबाद इस तरह ख़ुद अपना पहली बार मिरा घर लगा मुझे आया है कौन मेरी अयादत के वास्ते क्यूँँ अपना हाल पहले से बेहतर लगा मुझे क्या याद आ गया मुझे क्यूँँ याद आ गया ग़ुंचा खिला जो शाख़ पे पत्थर लगा मुझे — Akbar Ali Khan Arshi Zadah
कभी ज़ख़्म ज़ख़्म निखर के देख कभी दाग़ दाग़ सँवर के देख कभी तू भी टूट मिरी तरह कभी रेज़ा रेज़ा बिखर के देख सर-ए-ख़ार से सर-ए-संग से जो है मेरा जिस्म लहू लहू कभी तू भी तो मिरे संग-ए-मील कभी रंग मेरे सफ़र के देख इसी खेल से कभी पाएगा तू गुदाज़-ए-क़ल्ब की ने'मतें कभी रूठ जा कभी मन के देख कभी जीत जा कभी हर के देख ये पड़ी हैं सदियों से किस लिए तिरे मेरे बीच जुदाइयाँ कभी अपने घर तू मुझे बुला कभी रास्ते मिरे घर के देख तुझे आईने में न मिल सकेगा तिरी अदाओं का बाँकपन अगर अपना हुस्न है देखना तो मिरी ग़ज़ल में उतर के देख वही मेरा दर्द रवाँ-दवाँ वही तेरा हुस्न जवाँ जवाँ कभी 'मीर'-ओ-'दर्द' के बैत पढ़ कभी शे'र 'दाग़'-ओ-'जिगर' के देख — Akbar Ali Khan Arshi Zadah
हुस्न ही के दम से हैं ये कहानियाँ सारी इश्क़ ही सिखाता है ख़ुश-बयानियाँ सारी ख़्वाब और ख़ुशबू को चाहतों के जादू को क़ैद कर के दिखलाएँ पासबानियाँ सारी दिल की धड़कनों पर है इंहिसार-ए-अफ़्साना एक सी नहीं होतीं नौजवानियाँ सारी इक तबस्सुम-ए-पिन्हाँ इक निगाह-ए-दुज़्दीदा और फिर कहानी थीं सर-गिरानियाँ सारी याद बन के पहलू में मौसमों के बिस्तर पर करवटें बदलती हैं मेहरबानियाँ सारी क्या गिनाएँ अब तुम को हाँ सजा के रक्खी हैं हम ने गोशे गोशे में वो निशानियाँ सारी — Akbar Ali Khan Arshi Zadah
सन्नाटा तूफ़ाँ से सिवा हो ये भी तो हो सकता है ये कुछ और बड़ा धोका हो ये भी तो हो सकता है ज़ब्त-ए-जुनूँ से अंदाज़ों पर दर तो बंद नहीं होते तू मुझ से बढ़ कर रुस्वा हो ये भी तो हो सकता है रहने दे ये हर्फ़-ए-तसल्ली मेरी हिम्मत पस्त न कर नाकामी ही में रस्ता हो ये भी तो हो सकता है ढूँडने वाला ढूँड रहा है और अंदाज़ जफ़ाओं के मुझ को वफ़ा का ज़ख़्म लगा हो ये भी तो हो सकता है लाओ इक लम्हे को अपने-आप में डूब के देख आऊँ ख़ुद मुझ में ही मेरा ख़ुदा हो ये भी तो हो सकता है मुझ को तो ये ए'ज़ाज़ बहुत है लेकिन तेरी तमन्ना ने मेरे लबों से काम लिया हो ये भी तो हो सकता है आख़िर अपने क़दमों को क्यूँँ हम मुल्ज़िम ठहराते हैं राहों ने मुँह मोड़ लिया हो ये भी तो हो सकता है मेरे तसव्वुर ने बख़्शी है तन्हाई को भी इक महफ़िल तू महफ़िल महफ़िल तन्हा हो ये भी तो हो सकता है — Akbar Ali Khan Arshi Zadah
सिखा सकी न जो आदाब-ए-मय वो ख़ू क्या थी जो ये न था तो फिर इस दर्जा हाव-हू क्या थी जो बार-ए-दोश रहा सर वो कब था शोरीदा बहा न जिस से लहू वो रग-ए-गुलू क्या थी फिर एक ज़ख़्म-ए-कुशादा जो दिल को याद आ जाए वो लज़्ज़त-ओ-ख़लिश-ए-सोज़न-ओ-रफ़ू क्या थी जो इज़्न-ए-आम न था वालियान-ए-मय-ख़ाना ये सब नुमाइश-ए-पैमाना-ओ-सुबू क्या थी अगर निगाह-ए-जहाँ के शुमार में न थे हम तो फिर हमारी ये शोहरत भी चार-सू क्या थी न ख़ून-ए-शब था न शब-ख़ूँ ये मान लें लेकिन शफ़क़ तुलू-ए-सहर को लहू लहू क्या थी जब आ रही हैं बहारें लिए पयाम-ए-जुनूँ ये पैरहन को मिरे हाजत-ए-रफ़ू क्या थी तुम्हें शिकायत-ए-अहल-ए-वतन है क्यूँँ साहब ख़ुद अपने शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या थी — Akbar Ali Khan Arshi Zadah