aaj yuñ mujh se mila hai ki KHafaa ho jaiseus ka ye husn bhi kuchh meri KHataa ho jaise | आज यूँँ मुझ से मिला है कि ख़फ़ा हो जैसे

  - Akbar Ali Khan Arshi Zadah

आज यूँँ मुझ से मिला है कि ख़फ़ा हो जैसे
उस का ये हुस्न भी कुछ मेरी ख़ता हो जैसे

वही मायूसी का आलम वही नौमीदी का रंग
ज़िंदगी भी किसी मुफ़्लिस की दुआ हो जैसे

कभी ख़ामोशी भी यूँँ बोलती है प्यार के बोल
कोई ख़ामोशी में भी नग़्मा-सरा हो जैसे

हर्फ़-ए-दुश्नाम से यूँँ उस ने नवाज़ा हम को
ये मलामत ही मोहब्बत का सिला हो जैसे

इस तकल्लुफ़ से सितम हम पे रवा रखता है
ये भी मिनजुमला-ए-आदाब-ए-वफ़ा हो जैसे

ग़म-ए-अय्याम पे यूँँ ख़ुश हैं तिरे दीवाने
ग़म-ए-अय्याम भी इक तेरी अदा हो जैसे

बंदगी हम को तो आई कि न आई लेकिन
हुस्न यूँँ रूठ गया है कि ख़ुदा हो जैसे

  - Akbar Ali Khan Arshi Zadah

Khafa Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Akbar Ali Khan Arshi Zadah

As you were reading Shayari by Akbar Ali Khan Arshi Zadah

Similar Writers

our suggestion based on Akbar Ali Khan Arshi Zadah

Similar Moods

As you were reading Khafa Shayari Shayari