wahin gumaan hai jo us meherbaan se pahle tha | वही गुमाँ है जो उस मेहरबाँ से पहले था

  - Akbar Ali Khan Arshi Zadah

वही गुमाँ है जो उस मेहरबाँ से पहले था
वहीं से फिर ये सफ़र है जहाँ से पहले था

है इस निगह का करिश्मा कि मेरे दिल का हुनर
मैं उस के ग़म का शनासा बयाँ से पहले था

वो एक लम्हा मुझे क्यूँँ सता रहा है कि जो
नहीं के बा'द मगर उस की हाँ से पहले था

मैं ख़ुश हूँ हम-सफ़रों ने कि मुझ से छीन लिया
ग़ुरूर-ए-रहरवी जो कारवाँ से पहले था

वही इन आँखों ने देखा जो देखना था इन्हें
मैं ख़ुश-गुमाँ करम-ए-दोस्ताँ से पहले था

फ़ुग़ाँ कि तोड़ सका मैं न बे-कसी का तिलिस्म
मिरा नसीब मिरी दास्ताँ से पहले था

  - Akbar Ali Khan Arshi Zadah

Aankhein Shayari

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