geeli miTTi haath men le kar baitha hooñ | गीली मिट्टी हाथ में ले कर बैठा हूँ

  - Ambar Bahraichi

गीली मिट्टी हाथ में ले कर बैठा हूँ
ज़ेहन में इक धुँदले पैकर से उलझा हूँ

पीस रहा है दिल को इक वज़नी पत्थर
दूब को बाँहों में भर कर मैं हँसता हूँ

तेरे हाथों ने मुझ में सब रंग भरे
लेकिन हर पल ये एहसास अधूरा हूँ

धूप कभी चमकेगी इस उम्मीद पे मैं
बर्फ़ के दरिया में सदियों से लेटा हूँ

इस जानिब कब ऊदे बादल ने देखा
फिर भी मैं तन्हा सरसब्ज़ जज़ीरा हूँ

मेरा कर्ब मिरी तन्हाई की ज़ीनत
मैं चेहरों के जंगल का सन्नाटा हूँ

इक धुँदली तस्वीर अभी आँखों में है
इस वादी से दूर भला कब रहता हूँ

रात उफ़ुक़ पर कुछ साए लहराए थे
'अंबर' अब तक आस लगाए बैठा हूँ

  - Ambar Bahraichi

DP Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Ambar Bahraichi

As you were reading Shayari by Ambar Bahraichi

Similar Writers

our suggestion based on Ambar Bahraichi

Similar Moods

As you were reading DP Shayari Shayari