Ambar Bahraichi

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Ambar Bahraichi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Ambar Bahraichi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

जाने क्या सोच के फिर इन को रिहाई दे दी हम ने अब के भी परिंदों को तह-ए-दाम किया — Ambar Bahraichi

Ghazal

बुरीदा बाज़ुओं में वो परिंद लाला-बार था शिकारियों के ग़ोल में अजीब इंतिशार था हरे फलों को तोड़ती हुई हवा गुज़र गई बुझी बुझी फ़ज़ा में हर दरख़्त सोगवार था सफ़र का आख़िरी पड़ाव आ गया था और मैं जो हम-सफ़र बिछड़ रहे थे उन पे अश्क-बार था गए थे हम भी बहर की तहों में झूमते हुए हर एक सीप के लबों में सिर्फ़ रेगज़ार था धुली धुली फ़ज़ा में हो गई अबस वो जुस्तुजू कि मंज़र-ए-नज़र-नवाज़ तो पस-ए-ग़ुबार था दम-ए-सहर न जाने जाने कौन आ गया उसे रवाँ थे अश्क अँखड़ियों से हाथ में सितार था जो वक़्त आ गया तमाम तीर टूटते गए उसी नई कमाँ पे तो मुझे भी ए'तिबार था बरस रही थी आग इस दयार-ए-संग में मगर मिरे लहू में गुल-फ़िशाँ वो चम्पई अज़ार था अजीब थी सरिश्त भी हमारे धान पान की कभी तो बहर-ए-बे-कराँ कभी सराब-ज़ार था — Ambar Bahraichi
हँसते हुए चेहरे में कोई शाम छुपी थी ख़ुश-लहजा तख़ातुब की खनक नीम चढ़ी थी जल्वों की अना तोड़ गई एक ही पल में कचनार सी बिजली मेरे सीने में उड़ी थी पीता रहा दरिया के तमव्वुज को शनावर होंटों पे नदी के भी अजब तिश्ना-लबी थी ख़ुश-रंग मआ'नी के तआक़ुब में रहा मैं ख़त्त-ए-लब-ए-लालीं की हर इक मौज ख़फ़ी थी हर सम्त रम-ए-हफ़्त बला शोला-फ़िशाँ है बचपन में तो हर गाम पे इक सब्ज़-परी थी सदियों से है जलते हुए टापू की अमानत वो वादी-ए-गुल-रंग जो ख़्वाबों में पली थी जलते हुए कोहसार पे इक शोख़ गिलहरी मुँह मोड़ के गुलशन से ब-सद नाज़ खड़ी थी नेज़े की अनी थी रग-ए-अनफ़ास में रक़्साँ वो ताज़ा हवाओं में था खिड़की भी खुली थी हम पी भी गए और सलामत भी हैं 'अंबर' पानी की हर इक बूँद में हीरे की कनी थी — Ambar Bahraichi
मिरे चेहरे पे जो आँसू गिरा था न जाने कितने शोलों में जला था हमारे कान बहरे हो गए थे उधर वो दास्ताँ-गो हँस रहा था अँधेरी रात सन्नाटे का आलम नदी के पार इक लपका जगा था बहुत आज़ार थे रस्ते में लेकिन लहू में फूल-मौसम हँस रहा था हवा-ए-गर्म यूँँ दिल में चली थी मिरी आँखों में सावन बस गया था अँधेरे दश्त से निकले कि देखा सवा नेज़े पे सूरज आ चुका था लबों पे थी मिरे सुब्ह-ए-तबस्सुम मिरे बातिन में कोई रो रहा था बहुत दिन ब'अद खुल कर मिल रहे थे मिरे बच्चों को जाने क्या हुआ था बहुत मुश्ताक़ था शहर-ए-ख़मोशाँ कि बस्ती में फ़क़त 'अंबर' बचा था — Ambar Bahraichi
जलते हुए जंगल से गुज़रना था हमें भी फिर बर्फ़ के सहरा में ठहरना था हमें भी में'आर-नावाज़ी में कहाँ उस को सुकूँ था उस शोख़ की नज़रों से उतरना था हमें भी जाँ बख़्श था पल भर के लिए लम्स किसी का फिर कर्ब के दरिया में उतरना था हमें भी यारों की नज़र ही में न थे पँख हमारे ख़ुद अपनी उड़ानों को कतरना था हमें भी वो शहद में डूबा हुआ लहजा वो तख़ातुब इख़्लास के वो रंग कि डरना था हमें भी याद आए जो क़द्रों के महकते हुए गुलबन चाँदी के हिसारों से उभरना था हमें भी सोने के हंडोले में वो ख़ुश-पोश मगन था मौसम भी सुहाना था सँवरना था हमें भी हर फूल पे उस शख़्स को पत्थर थे चलाने अश्कों से हर इक बर्ग को भरना था हमें भी उस को था बहुत नाज़ ख़द्द-ओ-ख़ाल पे 'अंबर' इक रोज़ तह-ए-ख़ाक बिखरना था हमें भी — Ambar Bahraichi
हर तरफ़ उस के सुनहरे लफ़्ज़ हैं फैले हुए और हम काजल की इक तहरीर में डूबे हुए चाँदनी के शहर में हमराह था वो भी मगर दूर तक ख़ामोशियों के साज़ थे बजते हुए हँस रहा था वो हरी रुत की सुहानी छाँव में दफ़अ'तन हर इक शजर के पैरहन मैले हुए आज इक मासूम बच्ची की ज़बाँ खींची गई मेरी बस्ती में अंधेरे और भी गहरे हुए हर गली में थीं सियह परछाइयों की यूरिशें शब कई गूँगे मलक हर छत पे थे बैठे हुए सब अदाएँ वक़्त की वो जानता है इस लिए टाट के नीचे सुनहरा ताज है रक्खे हुए सूप के दाने कबूतर चुग रहा था और वो सहन को महका रही थी सुन्नतें पढ़ते हुए रात 'अंबर' कहकशाँ से दूब ये कहने लगी छाँव में मेरी हज़ारों चाँद हैं सोए हुए — Ambar Bahraichi
चेहरों पे ज़र-पोश अंधेरे फैले हैं अब जीने के ढंग बड़े ही महँगे हैं हाथों में सूरज ले कर क्यूँँ फिरते हैं इस बस्ती में अब दीदा-वर कितने हैं क़द्रों की शब-रेज़ी पर हैरानी क्यूँँ ज़ेहनों में अब काले सूरज पलते हैं हर भरे जंगल कट कर अब शहर हुए बंजारे की आँखों में सन्नाटे हैं फूलों वाले टापू तो ग़र्क़ाब हुए आग अगले नए जज़ीरे उभरे हैं उस के बोसीदा-कपड़ों पर मत जाओ मस्त क़लंदर की झोली में हीरे हैं ज़िक्र करो हो मुझ से क्या तुग़्यानी का साहिल पर ही अपने रेन बसेरे हैं इस वादी का तो दस्तूर निराला है फूल सरों पर कंकर पत्थर ढोते हैं 'अंबर' लाख सवा पंखी मौसम आएँ वोलों की ज़द में अनमोल परिंदे हैं — Ambar Bahraichi
गुलाब था न कँवल फिर बदन वो कैसा था कि जिस का लम्स बहारों में रंग भरता था जहाँ पे सादा-दिली के मकीं थे कुछ पैकर वो झोंपड़ा था मगर पुर-शिकोह कितना था मशाम-ए-जाँ से गुज़रती रही है ताज़ा हवा तिरा ख़याल खुले आसमान जैसा था उसी के हाथ में तमग़े हैं कल जो मैदाँ में हमारी छाँव में अपना बचाओ करता था ये सच है रंग बदलता था वो हर इक लम्हा मगर वही तो बहुत कामयाब चेहरा था हर इक नदी से कड़ी प्यास ले के वो गुज़रा ये और बात कि वो ख़ुद भी एक दरिया था वो एक जस्त में नज़रों से दूर था 'अंबर' ख़ला में सिर्फ़ सुनहरा ग़ुबार फैला था — Ambar Bahraichi
गीली मिट्टी हाथ में ले कर बैठा हूँ ज़ेहन में इक धुँदले पैकर से उलझा हूँ पीस रहा है दिल को इक वज़नी पत्थर दूब को बाँहों में भर कर मैं हँसता हूँ तेरे हाथों ने मुझ में सब रंग भरे लेकिन हर पल ये एहसास अधूरा हूँ धूप कभी चमकेगी इस उम्मीद पे मैं बर्फ़ के दरिया में सदियों से लेटा हूँ इस जानिब कब ऊदे बादल ने देखा फिर भी मैं तन्हा सरसब्ज़ जज़ीरा हूँ मेरा कर्ब मिरी तन्हाई की ज़ीनत मैं चेहरों के जंगल का सन्नाटा हूँ इक धुँदली तस्वीर अभी आँखों में है इस वादी से दूर भला कब रहता हूँ रात उफ़ुक़ पर कुछ साए लहराए थे 'अंबर' अब तक आस लगाए बैठा हूँ — Ambar Bahraichi
हर लम्हा सैराबी की अर्ज़ानी है मिट्टी के कूज़े में ठंडा पानी है चुपके चुपके रोता है तन्हाई में वो जो शहर के हर मेले का बानी है नदी किनारे शहर पनाहें बालों की सावन की बौछारें हैं तुग़्यानी है बाहर धूप समुंदर सुर्ख़ बगूले भी अंदर हर ख़ुलिए में रुत बर्फ़ानी है उस ने हर ज़र्रे को तिलिस्म-आबाद किया हाथ हमारे लगी फ़क़त हैरानी है मेरे दश्त को शायद उस ने देख लिया धूप शबनमी हर-सू मंज़र धानी है जाने क्या बरसा था रात चराग़ों से भोर समय सूरज भी पानी पानी है उस ने हर लम्हा ख़ुद को यूँँ राम किया हर पैकर में उस की राम-कहानी है कच्चा घर आता है याद बहुत 'अंबर' कहने को शहरों में हर आसानी है — Ambar Bahraichi
शब ख़्वाब के जज़ीरों में हँस कर गुज़र गई आँखों में वक़्त-ए-सुब्ह मगर धूल भर गई पिछली रुतों में सारे शजर बारवर तो थे अब के हर एक शाख़ मगर बे-समर गई हम भी बढ़े थे वादी-ए-इज़हार में मगर लहजे के इंतिशार से आवाज़ मर गई तुझ फूल के हिसार में इक लुत्फ़ है अजब छू कर जिसे हवा-ए-तरब-ए-मोतबर गई दिल में अजब सा तीर तराज़ू है इन दिनों हाँ ऐ निगाह-ए-नाज़ बता तू किधर गई मक़्सद सला-ए-आम है फिर एहतियात क्यूँँ बे-रंग रौज़नों से जो ख़ुशबू गुज़र गई उस के दयार में कई महताब भेज कर वादी-ए-दिल में इक अमावस ठहर गई अब के क़फ़स से दूर रही मौसमी हवा आज़ाद ताएरों के परों को कतर गई आँधी ने सिर्फ़ मुझ को मुसख़्ख़र नहीं किया इक दश्त-ए-बे-दिली भी मिरे नाम कर गई फिर चार-सू कसीफ़ धुएँ फैलने लगे फिर शहर की निगाह तेरे क़स्र पर गई अल्फ़ाज़ के तिलिस्म से 'अंबर' को है शग़फ़ उस की हयात कैसे भला बे-बुनर गई — Ambar Bahraichi
वो लम्हा मुझ को शश्दर कर गया था मिरे अंदर भी लावा भर गया था है दोनों सम्त वीरानी का आलम इसी रस्ते से वो लश्कर गया था गुज़ारी थी भँवर में उस ने लेकिन वो माँझी साहिलों से डर गया था क़लंदर मुतमइन था झोंपड़े में अबस उस के लिए महज़र गया था न जाने कैसी आहट थी फ़ज़ा में वो दिन ढलते ही अपने घर गया था अभी तक बाम-ओ-दर हैं फूल जैसे मिरे घर भी वो खुश-मंज़र गया था सितारे बा-अदब ठहरे हुए थे ख़ला में एक ख़ुश-पैकर गया था इधर आँखों में मेरी धूल ठहरी उधर शबनम से मंज़र भर गया था मगर तिश्ना-लबी ठहरी मुक़द्दर नदी के पास भी 'अंबर' गया था — Ambar Bahraichi
अब क़बीले की रिवायत है बिखरने वाली हर नज़र ख़ुद में कोई शहर है भरने वाली ख़ुश-गुमानी ये हुई सूख गया जब दरिया रेत से अब मिरी कश्ती है उभरने वाली ख़ुशबुओं के नए झोंके हैं हर इक धड़कन में कौन सी रुत है मिरे दिल में ठहरने वाली कुछ परिंदे हैं मगन मौसमी परवाजों में एक आँधी है पर-ओ-बाल कतरने वाली हम भी अब सीख गए सब्ज़ पसीने की ज़बाँ संग-ज़ारों की जबीनें हैं सँवरने वाली तेज़ धुन पर थे सभी रक़्स में क्यूँँ कर सुनते चंद लम्हों में बलाएँ थीं उतरने वाली बस उसी वक़्त कई ज्वाला-मुखी फूट पड़े मोतियों से मिरी हर नाव थी भरने वाली ढक लिया चाँद के चेहरे को सियह बादल ने चाँदनी थी मिरे आँगन में उतरने वाली दफ़अ'तन टूट पड़े चंद बगूले 'अंबर' ख़ुशबुएँ थीं मिरी बस्ती से गुज़रने वाली — Ambar Bahraichi
मैं अपनी वुसअतों को उस गली में भूल जाता हूँ न जाने कौन से जादू के हाथों में खिलौना हूँ सफ़र ये पानियों का जब मुझे बे-आब करता है मैं दरिया की रुपहली रेत को बिस्तर बनाता हूँ सवालों के कई पत्थर उठाए लोग बैठे हैं मैं अपना नन्हा बच्चा क़ब्र में दफ़ना के लौटा हूँ न जाने किस फ़ज़ा में खो गया वो दूधिया आँचल कि जिस के फ़ैज़ से मैं कितनी आँखों का उजाला हूँ वो सूरज मेरे चारों सम्त है फैला हुआ लेकिन मैं अक्सर अजनबी धुँदलाहटों में डूब जाता हूँ लिपट जाती है मेरी उँगलियों से ख़ुद शफ़क़ आ कर सहर की सम्त जब मैं अपने हाथों को बढ़ाता हूँ कोई तो है कि जो मुझ को उजाले बख़्श जाता है ब-ज़ाहिर मैं किसी तारीक टापू में अकेला हूँ मिरे सीने में 'अंबर' इक धनक सी फैल जाती है मैं अपने आँसुओं की चाँदनी में शे'र लिखता हूँ — Ambar Bahraichi
आज फिर धूप की शिद्दत ने बड़ा काम किया हम ने इस दश्त को लम्हों में कँवल-फ़ाम किया मेरे हुजरे को भी तशहीर मिली उस के सबब और आँधी ने भी इस बार बहुत नाम किया रोज़ हम जलती हुई रेत पे चलते ही न थे हम ने साए में खजूरों के भी आराम किया दिल की बाँहों में सजाते रहे आहों की धनक ज़ेहन को हम ने रह-ए-इश्क़ में गुम-नाम किया शहर में रह के ये जंगल की अदा भूल गए हम ने इन शोख़ ग़ज़ालों को अबस राम किया अपने पैरों में भी बिजली की अदाएँ थीं मगर देख कर तूर-ए-जहाँ ख़ुद को सुबुक-गाम किया शाह-राहों पे हमीं तो नहीं मस्लूब हुए क़त्ल-ए-महताब ने ख़ुद को भी लब-ए-बाम किया जाने क्या सोच के फिर इन को रिहाई दे दी हम ने अब के भी परिंदों को तह-ए-दाम किया ख़त्म हो गी ये कड़ी धूप भी 'अंबर' देखो एक कोहसार को मौसम ने गुल-अंदाम किया — Ambar Bahraichi
जगमगाती रौशनी के पार क्या था देखते धूल का तूफ़ाँ अंधेरे बो रहा था देखते सब्ज़ टहनी पर मगन थी फ़ाख़्ता गाती हुई एक शकरा पास ही बैठा हुआ था देखते हम अंधेरे टापुओं में ज़िंदगी करते रहे चाँदनी के देस में क्या हो रहा था देखते जान देने का हुनर हर शख़्स को आता नहीं सोहनी के हाथ में कच्चा घड़ा था देखते ज़ेहन में बस्ती रही हर बार जूही की कली बैर के जंगल से हम को क्या मिला था देखते आम के पेड़ों के सारे फल सुनहरे हो गए इस बरस भी रास्ता क्यूँँ रो रहा था देखते उस के होंटों के तबस्सुम पे थे सब चौंके हुए उस की आँखों का समुंदर क्या हुआ था देखते रात उजले पैरहन वाले थे ख़्वाबों में मगन दूधिया पूनम को किस ने डस लिया था देखते बीच में धुँदले मनाज़िर थे अगरचे सफ़-ब-सफ़ फिर भी 'अंबर' हाशिया तो हँस रहा था देखते — Ambar Bahraichi
गर्दिश का इक लम्हा यूँँ बेबाक हुआ सोने चाँदी का हर मंज़र ख़ाक हुआ नहर किनारे एक समुंदर प्यासा है ढलते हुए सूरज का सीना चाक हुआ इक शफ़्फ़ाफ़ तबीअत वाला सहराई शहर में रह कर किस दर्जा चालाक हुआ शब उजली दस्तारें क्या सर-गर्म हुईं भोर समय सारा मंज़र नमनाक हुआ वो तो उजालों जैसा था उस की ख़ातिर आने वाला हर लम्हा सफ़्फ़ाक हुआ ख़ाल-ओ-ख़द मंज़र पैकर और गुल बूटे ख़ूब हुए मेरे हाथों में चाक हुआ इक तालाब की लहरों से लड़ते लड़ते वो भी काले दरिया का पैराक हुआ मौसम ने करवट ली क्या आँधी आई अब के तो कोहसार ख़स-ओ-ख़ाशाक हुआ बातिन की सारी लहरें थीं जोबन पर उस के आरिज़ का तिल भी बेबाक हुआ चंद सुहाने मंज़र कुछ कड़वी यादें आख़िर 'अंबर' का भी क़िस्सा पाक हुआ — Ambar Bahraichi
क्यूँँ न हों शाद कि हम राह-गुज़र में हैं अभी दश्त-ए-बे-सब्ज़ में और धूप नगर में हैं अभी सुर्ख़ आज़र ही मिरे ज़ख़्मों पे न हो यूँँ मसरूर कई शहपर मिरे टूटे हुए पर में हैं अभी इन धुँदलकों की हर इक चाल तो शातिर है मगर नुक़रई नक़्श मिरे दस्त-ए-हुनर में हैं अभी उम्र भर मैं तो रहा ख़ाना-बदोशी में इधर कुछ कबूतर मिरे अस्लाफ़ के घर में हैं अभी एक मुद्दत से कोई सब्ज़ न उभरा इस में घोंसले चील के बे-बर्ग शजर में हैं अभी शहर की धूल फ़ज़ाएँ ही मुक़द्दर में रहीं आम के बोर मगर मेरी नज़र में हैं अभी राख के ढेर पे मातम न करो देखो भी कई शो'ले किसी बे-जान शरर में हैं अभी एक साहिर कभी गुज़रा था इधर से 'अंबर' जा-ए-हैरत कि सभी उस के असर में हैं अभी — Ambar Bahraichi