jagmagaati raushni ke paar kya tha dekhte | जगमगाती रौशनी के पार क्या था देखते

  - Ambar Bahraichi

जगमगाती रौशनी के पार क्या था देखते
धूल का तूफ़ाँ अंधेरे बो रहा था देखते

सब्ज़ टहनी पर मगन थी फ़ाख़्ता गाती हुई
एक शकरा पास ही बैठा हुआ था देखते

हम अंधेरे टापुओं में ज़िंदगी करते रहे
चाँदनी के देस में क्या हो रहा था देखते

जान देने का हुनर हर शख़्स को आता नहीं
सोहनी के हाथ में कच्चा घड़ा था देखते

ज़ेहन में बस्ती रही हर बार जूही की कली
बैर के जंगल से हम को क्या मिला था देखते

आम के पेड़ों के सारे फल सुनहरे हो गए
इस बरस भी रास्ता क्यूँँ रो रहा था देखते

उस के होंटों के तबस्सुम पे थे सब चौंके हुए
उस की आँखों का समुंदर क्या हुआ था देखते

रात उजले पैरहन वाले थे ख़्वाबों में मगन
दूधिया पूनम को किस ने डस लिया था देखते

बीच में धुँदले मनाज़िर थे अगरचे सफ़-ब-सफ़
फिर भी 'अंबर' हाशिया तो हँस रहा था देखते

  - Ambar Bahraichi

Shahr Shayari

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