Amir Hamza Saqib

Amir Hamza Saqib

@amir-hamza-saqib

Amir Hamza Saqib shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Amir Hamza Saqib's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

राह खुलती नहीं दर बंद हुआ जाता है मुझ से आगे मेरी क़िस्मत का लिखा जाता है — Amir Hamza Saqib

Ghazal

तिरे ख़याल के जब शामियाने लगते हैं सुख़न के पाँव मिरे लड़खड़ाने लगते हैं जो एक दस्त-ए-बुरीदा सवाद-ए-शौक़ में है अलम उठाए हुए उस के शाने लगते हैं मैं दश्त-ए-हू की तरफ़ जब उड़ान भरता हूँ तिरी सदा के शजर फिर बुलाने लगते हैं ख़बर भी है तुझे इस दफ़्तर-ए-मोहब्बत को जलाने जलने में क्या क्या ज़माने लगते हैं ये गर्द है मिरी आँखों में किन ज़मानों की नए लिबास भी अब तो पुराने लगते हैं तुम्हारे मेवा-ए-लब को निगह से छूते ही अजीब लज़्ज़त-ए-नायाब पाने लगते हैं जो सनसनाता है कूफ़ा ओ नैनवा का ख़याल गुलू-ए-जाँ की तरफ़ तीर आने लगते हैं — Amir Hamza Saqib
न तो बे-करानी-ए-दिल रही न तो मद्द-ओ-जज़्र-ए-तलब रहा तिरे बा'द बहर-ए-ख़याल में न ख़रोश उठा न ग़ज़ब रहा मिरे सामने से गुज़र गया वो ग़ज़ाल दश्त-ए-मुराद का मैं खड़ा रहा यूँँही बे-सदा मुझे पास-ए-हद-ए-अदब रहा उसे जाँ-गुज़ारों से क्या शग़फ़ उसे ख़ाकसारों से क्या शरफ़ वो फ़ज़ीलातों के दयार में ब-हुज़ूर पा-ए-नसब रहा वही बैअत-ए-ग़म-ए-हिज्र थी वही कश्फ़-ए-हुजरा-ए-वस्ल था मैं मुरीद-ए-हल्क़ा-ए-ख़्वाब था सो क़रीन-ए-मुर्शिद-ए-लब रहा तिरी मम्लिकत के निसाब पर कोई तब्सिरा भी करे तो क्या वही रौशनी का सफ़ीर है जो असीर-ए-ज़ुल्मत-ए-शब रहा — Amir Hamza Saqib