निज़ाम-ए-बस्त-ओ-कुशाद-ए-मानी सँवारते हैं

हम अपने शे'रों में तेरा पैकर उतारते हैं

अजब तिलिस्मी फ़िज़ा है सारी बलाएँ चुप हैं
ये किस बयाबाँ में रात दिन हम गुज़ारते हैं

ग़ुबार-ए-दुनिया में गुम है जब से सवार-ए-वहशत
अतश अतश दश्त ओ कोह ओ दरिया पुकारते हैं

मुसाफ़िरान-ए-गुमाँ रहें क्यूँ कमर-ख़मीदा
चलो ये पुश्तारा-ए-तमन्ना उतारते हैं

जबीन-ए-अहल-ए-ग़रज़ पे कोई मुकालिमा क्या
जहाँ तहाँ हाजतों की झोली पसारते हैं

— Amir Hamza Saqib

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