तेरी इनायतों का अजब रंग ढंग था

तेरे हुज़ूर पा-ए-क़नाअत में लंग था

सहरा को रौंदने की हवस पा-ब-गिल है अब
यूँ था कभी कि दामन-ए-आफ़ाक़ तंग था

दामन को तेरे थाम के राहत बड़ी मिली
अब तक मैं अपने आप से मसरूफ़-ए-जंग था

हँगाम-ए-याद दिल में न आहट न दस्तकें
शोरिश-कदे में रात ख़मोशी का रंग था

तू आया लौट आया है गुज़रे दिनों का नूर
चेहरों पे अपने वर्ना तो बरसों का ज़ंग था

रक़्स-ए-जुनूँ में भी था तरीक़-ए-हुनर का ढब
सूफ़ी-ए-बा-सफ़ा था कोई या मलंग था

क्या आसमाँ उठाते मोहब्बत में जब कि दिल
तार-ए-निगह में उलझी हुई इक पतंग था

— Amir Hamza Saqib

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