तिरे ख़याल के जब शामियाने लगते हैं

सुख़न के पाँव मिरे लड़खड़ाने लगते हैं

जो एक दस्त-ए-बुरीदा सवाद-ए-शौक़ में है
अलम उठाए हुए उस के शाने लगते हैं

मैं दश्त-ए-हू की तरफ़ जब उड़ान भरता हूँ
तिरी सदा के शजर फिर बुलाने लगते हैं

ख़बर भी है तुझे इस दफ़्तर-ए-मोहब्बत को
जलाने जलने में क्या क्या ज़माने लगते हैं

ये गर्द है मिरी आँखों में किन ज़मानों की
नए लिबास भी अब तो पुराने लगते हैं

तुम्हारे मेवा-ए-लब को निगह से छूते ही
अजीब लज़्ज़त-ए-नायाब पाने लगते हैं

जो सनसनाता है कूफ़ा ओ नैनवा का ख़याल
गुलू-ए-जाँ की तरफ़ तीर आने लगते हैं

— Amir Hamza Saqib

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