ताब खो बैठा हर इक जौहर-ए-ख़ाकी मेरा

जाने किस रंग में होगा गुल-ए-ख़ूबी मेरा

ज़ब्त-ए-गिर्या में है मश्शाक़ तमन्ना तू भी
क़तरा क़तरा सही दामन तो भिगोती मेरा

चाक-ए-वहशत से उतारा तो करम भी फ़रमा
यूँही कब से है धरा कूज़ा-ए-हस्ती मेरा

तेरी ख़ुशबू तिरा पैकर है मिरे शे'रों में
जान यूँही नहीं ये तर्ज़-ए-मिसाली मेरा

मेरी दुनिया इसी दुनिया में कहीं रहती है
वर्ना ये दुनिया कहाँ हुस्न-ए-तलब थी मेरा

— Amir Hamza Saqib

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