इख़्तिलाफ़ात में बीमार नज़र आते हैं
मुझ को ये सारे ही बेज़ार नज़र आते हैं
जितने जाहिल मिले इस शहर में हमको अब तक
सारे हाकिम के तरफ़दार नज़र आते हैं
सारे रंगों के गुलों से है चमन की ज़ीनत
ये चमन हो अभी गुलज़ार नज़र आते हैं
आँसुओ की मेरी आँखों में कुछ औक़ात नहीं
गरचे आते हैं तो बेकार नज़र आते हैं
हुक्म-ए-ज़रदार ये है उन को नज़रबंद करो
अम्न के जो भी तरफदार नज़र आते हैं
अब जो लिख दी है हक़ीक़त तो हम 'अज़हर' सबको
हैं तो शायर पर अदाकार नजर आते हैं
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