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Top 10 of Faheem Shanas Kazmi

Faheem Shanas Kazmi

Top 10 of Faheem Shanas Kazmi

    सारबाँ निकले थे जिस वक़्त घरों से अपने
    आशियानों को परिंदे भी नहीं छोड़ते जब
    रास्ते
    रस्तों की आग़ोश ही में सोए थे
    और हवा
    सब्ज़ पहाड़ों से नहीं उतरी थी
    आसमाँ पर अभी तारों की सजी थी महफ़िल
    सारबाँ निकले थे जिस वक़्त घरों से अपने
    रंग ख़्वाबों में अभी घुलते थे
    जिस्म में वस्ल की लज़्ज़त का नशा बाक़ी था
    गर्म बिस्तर में
    ''गुल-ए-ख़ूबी'' परेशाँ थी अभी
    दूध से ख़ूब भरा
    एक कटोरा था तिपाई पे धरा
    सारबाँ निकले थे जिस वक़्त सफ़र पर अपने
    चार-सू गहरी ख़मोशी थी
    चाँदनी रीत के सीने पे अभी सोई थी
    और धीरे से
    सबा ख़ुशबुएँ बिखराती थी
    ओस से भीगी हुई
    घास की हर पत्ती झुकी जाती थी
    रात के नील में कुछ नूर घुला जाता था
    ये जहाँ आईना-ख़ाना सा नज़र आता था
    सारबाँ गहरी ख़मोशी में घरों से निकले
    लौ चराग़ों की उन्हें झाँकती थी
    धूल क़दमों से लिपटते हुए ये कहती थी:
    तुम कहीं जाओ न अभी
    साए अश्जार से रस्तों पे उतर आए थे
    दर-ओ-दीवार ख़मोशी से थे फ़रियाद-कुनाँ
    थीं जुगाली में मगन ऊंटनियां
    घंटियाँ जागती थीं
    लज़्ज़त-ए-वस्ल से मदहोश हवा जागती थी
    पंखुड़ी होंटों पे ख़ामोश दु'आ जागती थी
    चार-सू गहरी ख़मोशी थी
    फ़ज़ा जागती थी
    सारबाँ निकले थे जिस वक़्त सफ़र पर अपने
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    Faheem Shanas Kazmi
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    जिन गलियों का सूरज
    रस्ता भूल गया हो
    उन में किसी भी आहट का
    कोई गीत नहीं गूँजा करता
    बोसीदा दरवाज़े
    खिड़कियाँ
    बल खाते चोबी ज़ीनों पर
    नाचती रहती है वीरानी
    गर्द-ओ-ग़ुबार में डूबे कमरे
    आपस में बातें करते हैं
    बंद दरीचे
    साँपों जैसी आँखों से
    दूर-दराज़ को जाने वाली
    सब्ज़ रुतों की यादों में
    रोते रोते सो जाते हैं
    उन सब लोगों की यादों में
    जिन की जिस्मों की ख़ुशबू को
    सैंत के रखने वाले लम्हे
    माह-ओ-साल की गर्द में दबते जाते हैं
    बंद घरों की ख़ुशबू से
    ख़ामोशी और तंहाई मौत की बातें करते हैं
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    Faheem Shanas Kazmi
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    रात ही रात में
    रास्ते शहरस जंगलों को मुड़े
    नींद गुम हो गई
    ख़ूब-सूरत हसीं ख़ूब-रू लड़कियाँ
    औरतें बन गईं
    बहते पानी में उन को बहाएा गया
    ख़्वाब-ज़ादे हुए दास्तानों में गुम
    रात ही रात में
    अज़दहे नौ-जवानों का दिल खा गए
    नेटी-जेटी पे सब लापता हो गए
    आन की आन में
    शहर कैसे मिटा
    ख़्वाब कैसे जिला
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    Faheem Shanas Kazmi
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    बारा-दरी में चाँद सर-ए-शाम हो गया
    रह-दारियाों के पर्दे उड़ाती रही हवा
    मशअल-तले ग़ुलाम की तलवार खो गई
    बुर्जी पे जब सितारा गिरा
    रात थी बहुत
    और शाह-ए-वक़्त अपने ही नश्शे में मस्त था
    पिशवाज़ नीचे दायरा उस को नहीं मिला
    बारा-दरी में आग लगी थी
    लगी रही
    और बाँसुरी के नय कहीं ख़ामोश रह गई
    और चाँद शाहज़ादी के क़दमों में सो गया
    फिर यूँँ हुआ कि दर्द से
    आँसू हुए गुलाब
    और आँखें हुईं चराग़
    यलग़ार रास्तों पे रही
    आँधियों की शब
    और धूल आसमान को बर्बाद कर गई
    सब आँगनों के कच्चे घड़ों में भरी है रेत
    पानी लहू हुआ
    सरशार ओ मस्त कैसे
    ज़मीं पर गिरा है ताज
    सो इस के ब'अद चाल ओ तारीख़ ने चली
    यलग़ार-ए-बर्क़-ओ-बाद हुई है गली गली
    बोसों में भीगती हुई तन्हाइयों की याद
    और सुब्ह की अज़ाँ से उड़े दिलबरी के रंग
    और ख़्वाब जंगलों में भटकते रहे कहीं

    बाला-हिसार
    शहर-ए-पिनह
    बाम-ओ-दर
    महल
    तूफ़ानी बारिशों में भी खिलते रहे गुलाब
    हम-जुफ़्त सारा शहर
    बारा-दरी में ज़िंदगी बे-नाम हो गई
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    Faheem Shanas Kazmi
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    जब शाम की पलकें थर्राईं
    यादों की आँखें भर आईं
    हर लहर में एक समुंदर था
    जो दिल को बहा ले जाता था
    साहिल से दूर जज़ीरों पर
    दिल बहते बहते डूब गया
    फिर रात हुई
    फिर हवा में आँसू घुलने लगे
    फिर ख़्वाबों की मेहराबों में
    मैं घर का रस्ता भूल गया
    फिर साँस से पहले मौत आई
    और खेल-तमाशा ख़त्म हुआ
    मैं बीच गली में कैसे गिर कर
    टूट गया
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    Faheem Shanas Kazmi
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    उस को मिरे ख़्वाबों का रस्ता
    जाने किस ने दिखाया है
    मैं जब आधी रात को थक कर
    अपने-आप पे गिरता हूँ
    वो चुपके से आ जाती है
    सब्ज़ सुनहरे ख़्वाब लिए
    नर्म गुलाबी हाथों से मिरे बालों को सुलझाती है
    धी
    में सुरों में
    'फ़ैज़' की नज़्म सुनाती है
    मैं उस को देखता रहता हूँ

    नींद में जागता रहता हूँ
    और वो मेरे बाज़ू पर
    सर रख कर सो जाती है
    सपनों में खो जाती है
    वो ख़्वाब में हँसती रहती है
    मैं जाग के रोता रहता हूँ
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    Faheem Shanas Kazmi
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    इश्क़ की तुंद-ख़ेज़ी के औक़ात आख़िर हुए
    ऐ मुबारज़-तलब ज़िंदगी
    अलविदा
    अलविदा..... अपने औक़ात आख़िर हुए
    ख़्वाब की लहर में
    दर्द के शहर में
    गर्द..... रख़्त-ए-सफ़र
    दिल लहू में है तर
    ज़िंदगी कट गई तेग़ की धार पर
    सज्दा करते जबीं कितनी ज़ख़्मी हुई
    और ख़ुदा आज तक हम से राज़ी नहीं
    और ज़मीं सख़्त है
    मंज़िलें गर्द हैं

    बादलों की तरह ग़म बरसता रहा
    चार जानिब यहाँ आग ही आग है
    ऐ मुबारज़-तलब ज़िंदगी
    प्यार के फूल ले
    दर्द की धूल ले
    मेरे होने के सब ख़्वाब लौटा मुझे
    आख़िरी शाम है
    आख़िरी म'अरका है
    कि फिर इस के ब'अद

    हम कहाँ तुम कहाँ
    और हुए भी अगर तो फिर ऐसे कहाँ
    आख़िरी वार तेरा है कारी बहुत
    ग़म की शिद्दत से दिल मेरा भारी बहुत
    वार
    इक और वार
    मौत के सर्द बोसे से सरशार दिल
    तेरी क़ुर्बत की चाहत में मरता रहा
    उम्र भर तुझ से जारी रहा म'अरका

    ऐ मुबारज़-तलब ज़िंदगी
    दिन भी ढल ही गया
    शाम भी थक गई
    रूह-ए-उम्र-ए-रवाँ
    हो रही है अज़ाँ
    शाम ढलने से पहले हमें अज्र दे
    यूँँ हमें अज्र दे
    जाँ रहे ही नहीं
    ख़स्ता तन में कहीं
    हम कहें अलविदा
    अलविदा
    ऐ मुबारज़-तलब ज़िंदगी इश्क़ की तुंद-ख़ेज़ी के औक़ात आख़िर हुए
    ज़िंदगी तेरे लम्हात आख़िर हुए
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    Faheem Shanas Kazmi
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    रस्ते में शाम हो गई क़िस्सा तमाम हो चुका
    जो कुछ भी था ऐ ज़िंदगी वो तेरे नाम हो चुका

    कब की गुज़र गई वो शब जिस में किसी का नूर था
    कब की गली में धूप है जीना हराम हो चुका

    फिरते रहें नगर नगर कूचा-ब-कूचा दर-ब-दर
    अपने ख़ियाम जल चुके अपना सलाम हो चुका

    रात में बाक़ी कुछ नहीं नींद में बाक़ी कुछ नहीं
    अपना हर एक ख़्वाब तो नज़्र-ए-अवाम हो चुका

    उस के लबों की गुफ़्तुगू करते रहे सुबू सुबू
    या'नी सुख़न हुए तमाम या'नी कलाम हो चुका
    इश्क़ गर ऐसा इश्क़ है आँखों से बहने दो लहू
    ज़ीस्त गर ऐसी ज़ीस्त है अपना तो काम हो चुका

    रस्ते तमाम हो गए उस की गली के आस-पास
    या'नी ख़िराम हो चुका या'नी क़याम हो चुका
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    Faheem Shanas Kazmi
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    हुस्न अल्फ़ाज़ के पैकर में अगर आ सकता
    कैसा होता है ख़ुदा तुम को मैं दिखला सकता

    इस सफ़र पे हूँ कि हलकान हुआ जाता हूँ
    और कहाँ जाना है ये भी नहीं बतला सकता

    हारना भी है यक़ीनी पे मिरी फ़ितरत है
    एक ही चाल हमेशा नहीं दोहरा सकता

    ज़िंदगी अब तू मुझे और खिलौने ला दे
    ऐसे ख़्वाबों से तो मैं दिल नहीं बहला सकता

    मैं भी तक़दीर के लिक्खे पे यक़ीं ले आता
    वक़्त इक बार जो उस से मुझे मिलवा सकता
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    Faheem Shanas Kazmi
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    समझ रहा था मैं ये दिन गुज़रने वाला नहीं
    खुला कि कोई भी लम्हा ठहरने वाला नहीं

    कोई भी रस्ता किसी सम्त को नहीं जाता
    कोई सफ़र मिरी तकमील करने वाला नहीं

    हवा की अब्र की कोशिश तो पूरी पूरी है
    मगर धुवें की तरह मैं बिखरने वाला नहीं

    मैं अपने-आप को बस एक बार देखूँगा
    फिर इस के ब'अद किसी से भी डरने वाला नहीं

    चराग़-ए-जाँ लिए किस दश्त में खड़ा हूँ मैं
    कोई भी क़ाफ़िला याँ से गुज़रने वाला नहीं

    मैं क्या करूँँ कोई तस्वीर गर अधूरी है
    मैं अपने रंग तो अब उस में भरने वाला नहीं
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    Faheem Shanas Kazmi
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Khalil Ur Rehman QamarKhalil Ur Rehman QamarZubair Ali TabishZubair Ali TabishFarhat EhsaasFarhat EhsaasAzhar FaraghAzhar FaraghShahid ZakiShahid ZakiJaan Nisar AkhtarJaan Nisar AkhtarAjiz MatviAjiz MatviAllama IqbalAllama IqbalMeraj FaizabadiMeraj FaizabadiChakbast Brij NarayanChakbast Brij Narayan