वो टुकड़ा रात का बिखरा हुआ सा
अभी तक दिन पे है ठहरा हुआ सा
अभी तक दिन पे है ठहरा हुआ सा
उदासी एक लम्हे पर गिरी थी
सदी का बोझ है पसरा हुआ सा
इधर खिड़की में था मायूस चेहरा
उधर भी चाँद है उतरा हुआ सा
करे है शोर यूँ सीने में ये दिल
समूचा जिस्म है बहरा हुआ सा
ये किन नज़रों से मुझ को देखते हो
रहूँ हर दम सजा-संवरा हुआ सा
सुखाने ज़ुल्फ़ वो आए हैं छत पर
है सूरज आज फिर सहरा हुआ सा
लिखा उस नाम का पहला ही अक्षर
मुकम्मल पेज है चेहरा हुआ सा
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अब उम्र तो ये बीत चली सोचते तुम्हें
इतना हुआ है हाँ कि ज़रा मैं सँवर गया
सिमटा था जब तलक वो हथेली में ठीक था
पहुँचा लबों पे लम्स तो नस-नस बिखर गया
यूँ तो दहक रहा था वो सूरज सा दूर से
जो पास जा के छू लिया कैसा सिहर गया
देखूँ तुझे क़रीब से फ़ुर्सत से चैन से
मेरा ये ख़्वाब मुझ को लिए दर-ब-दर गया
इक रोज़ तेरा नाम सर-ए-राह ले लिया
चलता हुआ ये शग़्ल अचानक ठहर गया
मिस्रा सिसक रहा था अकेला जो देर से
याद उस की आ गई तो ग़ज़ल में उतर गया
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बस गई है रग रग में बाम-ओ-दर की ख़ामोशी
चीरती सी जाती है मुझ को घर की ख़ामोशी
चीरती सी जाती है मुझ को घर की ख़ामोशी
सुब्ह के उभरने से शाम के उतरने तक
कितनी जान-लेवा है दोपहर की ख़ामोशी
चल रही थी जब मेरे घर के जलने की तफ़तीश
देखने के क़ाबिल थी शहर भर की ख़ामोशी
काट ली हैं तुम ने तो टहनियाँ सभी लेकिन
सुन सको जो कहती है चुप शजर की ख़ामोशी
तोड़ भी दो चुप्पी को रूठने को तज डालो
हो गई है पर्बत सी बात भर की ख़ामोशी
पड़ गई है आदत अब साथ तेरे चलने की
बिन तिरे कटे कैसे ये सफ़र की ख़ामोशी
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उजली उजली बर्फ़ के नीचे पत्थर नीला नीला है
तेरी यादों में ये सर्द दिसम्बर नीला नीला है
तेरी यादों में ये सर्द दिसम्बर नीला नीला है
दिन की रंगत ख़ैर गुज़र जाती है तेरे बिन लेकिन
कत्थई कत्थई रातों का हर मंज़र नीला नीला है
दूर इधर खिड़की पर बैठी सोच रही हो मुझ को क्या
चाँद उधर छत पर आया है थक कर नीला नीला है
तेरी नीली चुनरी ने क्या हाल किया बाग़ीचे का
नारंगी फूलों वाला गुल-मोहर नीला नीला है
बादल के पीछे का सच अब खोला तेरी आँखों ने
तू जो निहारे रोज़ उसे तो अंबर नीला नीला है
हुस्न भले हो रौशन तेरा लाल गुलाबी रंग लिए इश्क़ का तेरे परतव लेकिन दिल पर नीला नीला है
इक तो तू भी साथ नहीं है ऊपर से ये बारिश उफ़
घर तो घर सारा का सारा दफ़्तर नीला नीला है
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ज़िंदगी से उम्र-भर तक चलने का वा'दा किया
ऐ मिरी कम्बख़्त साँसों हाए तुम ने क्या किया
ऐ मिरी कम्बख़्त साँसों हाए तुम ने क्या किया
इब्तिदा-ए-होश से अच्छा-भला पत्थर था मैं
इक नज़र बस देख कर तू ने मुझे दरिया किया
एक बस ख़ामोश से लम्हे की ख़्वाहिश ही तो थी
और उसी ख़्वाहिश ने लेकिन शोर फिर कितना किया
लुत्फ़ अब देने लगी है ये उदासी भी मुझे
शुक्रिया तेरा कि तू ने जो किया अच्छा किया
सोचता हूँ कौन से इल्ज़ाम और अब रह गए
हाँ तुझे चाहा तुझे पूजा तिरा सज्दा किया
दी नहीं तस्वीर अपनी तू ने दीवाने को जब
यूँ किया वल्लाह उस ने ख़ुद को ही तुझ सा किया
कब तलक आख़िर ये सहती रहती ख़्वाबों की तपिश
तंग आ कर नींद ने पलकों से लो तौबा किया
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साँझ फिसल कर डेवढ़ी पर आ लटकी है
आँगन से चौबारे तक सब लाल हुआ
याद वहीं ठिठकी है जहाँ तुम छोड़ गए
लम्हा दिन सप्ताह महीना साल हुआ
धूप अटक कर बैठा गई है छज्जे पर
ओसारे का उठना आज मुहाल हुआ
चुन चुन कर वो देता था हर दर्द मुझे
चोट लगी जब ख़ुद को तो बेहाल हुआ
कल तक जो देता था उतर प्रश्नों का
आज वही उलझा सा एक सवाल हुआ
छुटपन में जिस की संगत थी चैन मिरा
उम्र बढ़ी तो वो जी का जंजाल हुआ
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काली रातों के सलीक़े दिन को क्यूँ भाने लगे
सोच कर गुम-सुम है धरती आसमाँ बेचैन है
काग़ज़ों पर हो गए सारे ख़ुलासे ही मगर
कुछ तो है जो हाशियों के दरमियाँ बेचैन है
जब से साज़िश में समुंदर की हवा शामिल हुई
कश्ती है चुप-चाप सी और बादबाँ बेचैन है
भेद जब सरगोशियों का खुल के आया सामने
शोर वो उट्ठा है अपना हुक्मराँ बेचैन है
हिज्र के मौसम की कुछ मत पूछिए उफ़ दास्ताँ
मैं यहाँ बेताब हूँ तो वो वहाँ बेचैन है
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हैं जितनी परतें यहाँ आसमान में शामिल
सभी हुईं मिरी हद की उड़ान में शामिल
सभी हुईं मिरी हद की उड़ान में शामिल
बढ़ा है शहर में रुत्बा ज़रा हमारा भी
हुए हैं जैसे हम उन के बयान में शामिल
उछाल यूँ ही नहीं बढ़ गई है लहरों की
नदी का ज़ोर भी है कुछ ढलान में शामिल
धुआँ ग़ुबार परिंदे तपिश घुटन ख़ुश्बू
हैं बोझ कितने हवा की थकान में शामिल
थीं क़िस्त जितनी भी ख़्वाबों की बे-हिसाब पड़ी
किया है नींद ने सब को लगान में शामिल
सुना है नाम से तेरे हैं बिकते अफ़्साने
मुझे भी कर ले कभी दास्तान में शामिल
ज़रा सी दोस्ती की हम से क़ाफ़ियों ने किया
किया ग़ज़ल ने हमें ख़ानदान में शामिल
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बात रुक रुक कर बढ़ी फिर हिचकियों में आ गई
फ़ोन पर जो हो न पाई चिट्ठियों में आ गई
फ़ोन पर जो हो न पाई चिट्ठियों में आ गई
सुब्ह दो ख़ामोशियों को चाय पीते देख कर
गुनगुनी सी धूप उतरी प्यालियों में आ गई
ट्रेन ओझल हो गई इक हाथ हिलता रह गया
वक़्त रुख़्सत की उदासी चूड़ियों में आ गई
अध-खिली रखी रही यूँ ही वो नॉवेल गोद में
उठ के पन्नों से कहानी सिसकियों में आ गई
चार दिन होने को आए काल इक आया नहीं
चुप्पी मोबाइल की अब बेचैनियों में आ गई
बाट जो है थक गई छत पर खड़ी जब दोपहर
शाम की चादर लपेटे खिड़कियों में आ गई
रात ने यादों की माचिस से निकाली तीलियाँ
और इक सिगरेट सुलगी उँगलियों में आ गई
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हवा जब किसी की कहानी कहे है
नए मौसमों की ज़बानी कहे है
नए मौसमों की ज़बानी कहे है
फ़साना है जिस्मों का बे-शक ज़मीनी
मगर रूह तो आसमानी कहे है
तुझे चल ज़रा सा मैं मीठा बना दूँ
समुंदर से दरिया का पानी कहे है
डसा रत-जगों ने है ख़्वाबों को फिर से
सुलगती हुई रात-रानी कहे है
लटें चंद चाँदी की बख़्शीं तुझे जा
विदाअ''' लेती मुझ से जवानी कहे है
है चढ़ने लगी फिर से ढलती हुई उम्र
तिरी शर्ट ये ज़ा'फ़रानी कहे है
नई बात हो अब नए गीत छेड़ो
गुज़रती घड़ी हर पुरानी कहे है
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