Parvez Sahir

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Parvez Sahir shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Parvez Sahir's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

मेरी तबाह-हाली को भी देख कर उसे हैरत है मेरे हाल पे हैरत नहीं हुई — Parvez Sahir
वक़्त अच्छा ज़रूर आता है पर कभी वक़्त पर नहीं आता — Parvez Sahir

Ghazal

अद्ल को भी मीज़ान में रखना पड़ता है हर एहसान एहसान में रखना पड़ता है यूँँ ही ज्ञान की दौलत हाथ नहीं आती बे-ध्यानी को ध्यान में रखना पड़ता है जब भी सफ़र पर जाने लगो तो याद रहे ख़ुद को भी सामान में रखना पड़ता है अपने होने और न होने का इम्कान होनी के इम्कान में रखना पड़ता है इस नीले आकाश को छू लेने के लिए ख़ुद को ऊँची उड़ान में रखना पड़ता है यूँँ ही जंग कभी जीती नहीं जा सकती क़दम अपना मैदान में रखना पड़ता है थोड़ी देर तिलावत कर चिकने के ब'अद मोर का पर क़ुरआन में रखना पड़ता है कभी कभी तो नफ़अ के लालच में 'साहिर'! ख़ुद को किसी नुक़सान में रखना पड़ता है — Parvez Sahir
ब-ज़ोम-ए-ख़ुद कहीं ख़ुद से वरा न हो जाऊँ ख़ुदा-न-ख़्वास्ता मैं भी ख़ुदा न हो जाऊँ बस एक ध्यान की मैं उँगली थाम रखी है कि भीड़ में कहीं ख़ुद से जुदा न हो जाऊँ ये सोचता हूँ किसी दिल में घर करूँँ मैं भी और उस से पहले यहाँ बे-ठिकाना हो जाऊँ ये जी में आता है मेरे कि रफ़्तगाँ की तरह मैं आज मुल्क-ए-अदम को रवाना हो जाऊँ सब अहल-ए-दहर मुझे ढूँडते न रह जाएँ मैं अपनी ज़ात ही में लापता न हो जाऊँ कोई तो हो जो मुझे ज़िंदगी ही में पाए किसी के हाथ में आया ख़ज़ाना हो जाऊँ जो हो सके तो मिरे जीते-जी ही क़द्र करो मबादा मैं कोई गुज़रा ज़माना हो जाऊँ बस एक तजरबा मेरे लिए बहुत है दिला इक और इश्क़ में फिर मुब्तला न हो जाऊँ मैं इक चराग़-ए-सर-ए-रहगुज़ार हूँ 'साहिर' हवा के साथ बिल-आख़िर हवा न हो जाऊँ — Parvez Sahir
सौदा-ए-इश्क़ यूँँ भी उतरना तो है नहीं ये ज़ख़्म-ए-रूह है इसे भरना तो है नहीं सौ बार आइना भी जो देखें तो फ़ाएदा? सूरत को ख़ुद-ब-ख़ुद ही सँवरना तो है नहीं मुझ को ख़बर है दहर में ज़िंदा रहूँगा मैं 'बुल्ल्हे' की तरह मर के भी मरना तो है नहीं जिस लहर को निगल गई इक लहर दूसरी उस लहर को दोबारा उभरना तो है नहीं तू जो यक़ीन कर ले कि वो है तो फिर वो है शय का वजूद अस्ल में वर्ना तो है नहीं! धरनाई की तरह से जो धरना भी दूँ तो क्या? धरती पे उस ने फिर भी उतरना तो है नहीं करता हूँ ख़ुद ही मबहस ओ तक़रीर से गुरेज़ तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ आप से करना तो है नहीं वो जिस को अपने-आप से लगता नहीं है डर उस को ख़ुदा की ज़ात से डरना तो है नहीं क्यूँँ उस के इंतिज़ार में बैठा हूँ देर से? इस रह-गुज़र से उस ने गुज़रना तो है नहीं 'साहिर' ये मेरा दीदा-ए-गिर्यां है और मैं सहरा में कोई दूसरा झरना तो है नहीं — Parvez Sahir
चश्म-ए-ख़ुश-आब की तमसील नहीं हो सकती ऐसी शफ़्फ़ाफ़ कोई झील नहीं हो सकती मेरी फ़ितरत ही में शामिल है मोहब्बत करना और फ़ितरत कभी तब्दील नहीं हो सकती उस के दिल में मुझे इक जोत जगाना पड़ेगी ख़ुद ही रौशन कोई क़िंदील नहीं हो सकती सिक्का-ए-दाग़ ओ ज़र-ए-ग़म से भरा है मिरा दिल देख ख़ाली मिरी ज़म्बील नहीं हो सकती इस लिए शिद्दत-ए-सदमात में रो देता हूँ मुझ से जज़्बात की तश्कील नहीं हो सकती दुख तो ये है, वो मिरे दुख को समझता ही नहीं उस तक एहसास की तर्सील नहीं हो सकती छोड़ आया हूँ तिरा दफ़्तर-ए-दरबार-नुमा अब तिरे हुक्म की तामील नहीं हो सकती इस कसाफ़त की लताफ़त से भला क्या निस्बत? तीरगी नूर में तहलील नहीं हो सकती लाज़मी तो नहीं 'साहिर'! वो मुझे मिल जाए या'नी हर ख़्वाब की तकमील नहीं हो सकती — Parvez Sahir
सौदा-ए-इश्क़ यूँ भी उतरना तो है नहीं ये ज़ख़्म-ए-रूह है इसे भरना तो है नहीं सौ बार आइना भी जो देखें तो फ़ाएदा सूरत को ख़ुद-ब-ख़ुद ही संवरना तो है नहीं मुझ को ख़बर है दहर में ज़िंदा रहूॅंगा मैं 'बुल्ल्हे' की तरह मर के भी मरना तो है नहीं जिस लहर को निगल गई इक लहर दूसरी उस लहर को दोबारा उभरना तो है नहीं तू जो यक़ीन कर ले कि वो है तो फिर वो है शय का वजूद अस्ल में वर्ना तो है नहीं धरनाई की तरह से जो धरना भी दूँ तो क्या धरती पे उस ने फिर भी उतरना तो है नहीं करता हूँ ख़ुद ही मबहस ओ तक़रीर से गुरेज़ तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ आप से करना तो है नहीं वो जिस को अपने-आप से लगता नहीं है डर उस को ख़ुदा की ज़ात से डरना तो है नहीं क्यूँ उस के इंतिज़ार में बैठा हूँ देर से इस रह-गुज़र से उस ने गुज़रना तो है नहीं 'साहिर' ये मेरा दीदा-ए-गिर्यां है और मैं सहरा में कोई दूसरा झरना तो है नहीं — Parvez Sahir