waqt achha zaroor aata hai | वक़्त अच्छा ज़रूर आता है

  - Parvez Sahir

वक़्त अच्छा ज़रूर आता है
पर कभी वक़्त पर नहीं आता

  - Parvez Sahir

Waqt Shayari

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    माँ की आग़ोश में कल मौत की आग़ोश में आज
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    आज कल होता गया और दिन हवा होते गए
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    नैरंगी-ए-ख़याल पे हैरत नहीं हुई
    मुझ को किसी कमाल पे हैरत नहीं हुई

    मेरी तबाह-हाली को भी देख कर उसे
    हैरत है मेरे हाल पे हैरत नहीं हुई

    पूछा था मैं ने जब उसे क्या मुझ से इश्क़ है?
    उस को मिरे सवाल पे हैरत नहीं हुई

    देखा जो एक उम्र के ब'अद उस ने आइना
    ख़ुद अपने ख़द-ओ-ख़ाल पे हैरत नहीं हुई

    इक उम्र से मैं रफ़्ता-ए-रफ़्तार-ए-यार हूँ
    मुझ को रम-ए-ग़ज़ाल पे हैरत नहीं हुई

    आख़िर ग़ुरूब होना ही था आफ़्ताब-ए-उम्र
    मुझ को मिरे ज़वाल पे हैरत नहीं हुई

    वो शख़्स इस जहान का था ही नहीं कभी
    'साहिर' के इंतिक़ाल पे हैरत नहीं हुई
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    Parvez Sahir
    मेरी तबाह-हाली को भी देख कर उसे
    हैरत है मेरे हाल पे हैरत नहीं हुई
    Parvez Sahir
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    सौदा-ए-इश्क़ यूं भी उतरना तो है नहीं
    ये ज़ख़्म-ए-रूह है इसे भरना तो है नहीं

    सौ बार आइना भी जो देखें तो फ़ाएदा
    सूरत को ख़ुद-बख़ुद ही संवरना तो है नहीं

    मुझ को ख़बर है दहर में ज़िंदा रहूंगा मैं
    'बुल्ल्हे' की तरह मर के भी मरना तो है नहीं

    जिस लहर को निगल गई इक लहर दूसरी
    उस लहर को दोबारा उभरना तो है नहीं

    तू जो यक़ीन कर ले कि वो है तो फिर वो है
    शय का वजूद अस्ल में वर्ना तो है नहीं

    धरनाई की तरह से जो धरना भी दूं तो क्या
    धरती पे उस ने फिर भी उतरना तो है नहीं

    करता हूं ख़ुद ही मबहस ओ तक़रीर से गुरेज़
    तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ आप से करना तो है नहीं

    वो जिस को अपने-आप से लगता नहीं है डर
    उस को ख़ुदा की ज़ात से डरना तो है नहीं

    क्यूं उस के इंतिज़ार में बैठा हूं देर से
    इस रह-गुज़र से उस ने गुज़रना तो है नहीं

    'साहिर' ये मेरा दीदा-ए-गिर्यां है और मैं
    सहरा में कोई दूसरा झरना तो है नहीं
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    Parvez Sahir
    सौदा-ए-इश्क़ यूँ भी उतरना तो है नहीं
    ये ज़ख़्म-ए-रूह है इसे भरना तो है नहीं

    सौ बार आइना भी जो देखें तो फ़ाएदा?
    सूरत को ख़ुद-बख़ुद ही सँवरना तो है नहीं

    मुझ को ख़बर है दहर में ज़िंदा रहूँगा मैं
    'बुल्ल्हे' की तरह मर के भी मरना तो है नहीं

    जिस लहर को निगल गई इक लहर दूसरी
    उस लहर को दोबारा उभरना तो है नहीं

    तू जो यक़ीन कर ले कि वो है तो फिर वो है
    शय का वजूद अस्ल में वर्ना तो है नहीं!

    धरनाई की तरह से जो धरना भी दूँ तो क्या?
    धरती पे उस ने फिर भी उतरना तो है नहीं

    करता हूँ ख़ुद ही मबहस ओ तक़रीर से गुरेज़
    तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ आप से करना तो है नहीं

    वो जिस को अपने-आप से लगता नहीं है डर
    उस को ख़ुदा की ज़ात से डरना तो है नहीं

    क्यूँ उस के इंतिज़ार में बैठा हूँ देर से?
    इस रह-गुज़र से उस ने गुज़रना तो है नहीं

    'साहिर' ये मेरा दीदा-ए-गिर्यां है और मैं
    सहरा में कोई दूसरा झरना तो है नहीं
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    Parvez Sahir
    कोई नज़र न पड़ सके मुझ हाल-मस्त पर
    बैठा हुआ हूँ इस लिए पिछली निशस्त पर

    इक मौज-ए-आतिशीं रग-ओ-पै में उतर गई
    रखा है उस ने जूँ ही कफ़-ए-दस्त, दस्त पर

    कब रास आई मुझ को मिरी फ़तह की ख़ुशी
    मैं दिल-शिकस्ता हो गया उस की शिकस्त पर

    है याद मुझ को आज भी पहला मुकालिमा
    क़ाइम हूँ मैं तो आज भी अहद-ए-अलस्त पर

    कैसे सँभाल रक्खा है इक ज़ात ने उसे
    शश्दर हूँ काएनात के कुल बंद-ओ-बस्त पर

    तय मरहला किया है अदम से वजूद का
    पहुँचा हूँ तब मैं मंज़िल-ए-ना-हस्त-ओ-हस्त पर

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    हैरत-ज़दा हैं सब मिरी रूहानी जस्त पर
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    Parvez Sahir

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