क्या तुझे राज़-ए-निहाँ बतलाऊँ
    दर्द इन्साँ के लिए नेमत है
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    हिज्र के अँधेरों से दिल बुझा सा रहता है
    इस चराग़-ए-उल्फ़त को वस्ल की ज़िया दे दो
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    तेरी ज़ुल्फ़ों का क्या बयान करूँ
    तेरी नालैन अर्श पर जानाँ
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    तेरा नंबर भी आएगा ज़रा रूक
    अभी मर्दुम-शुमारी चल रही है
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    हमने जन्नत इन्हें दिखाई थी
    और दोज़ख में पड़ रहे हैं लोग

    हम हैं 'रिज़वाँ' बनी अबू-तालिब
    हम से सदियों से लड़ रहे हैं लोग
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    मेरे गुलशन के बुलबुल को नहीं सय्याद का खटका
    मगर सहमा सा रहता है चमन के पासबानों से
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    गर समाअत हो तुझे ऐ हम-सफ़ीर
    इक समुन्दर गुफ़्तगू का दिल में है
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    अब सितारे टूट कर गिरने लगे
    आस्माँ अब ख़ाक में मिल जाएगा
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    उसके जल्वे तो आम हैं लेकिन
    उसके रुख़ पर नक़ाब है अब तक
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    फिर वही लौट के आने का बहाना कर के
    वो दे के मुझको कोई आस चला जाता है

    उसके आने में यही दुख है कि वो शाम-ए-विसाल
    जब भी आता है मेरे पास चला जाता है
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