RIZWAN ALI RIZWAN

RIZWAN ALI RIZWAN

@rizwanalirizwan

RIZWAN ALI RIZWAN shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in RIZWAN ALI RIZWAN's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

तेरे चहरे को पढ़ना चाहिए था मगर वो शख़्स माला पढ़ रहा है — RIZWAN ALI RIZWAN
अभी तुम दिन के मानी मत बताओ अभी तो रात होती जा रही है — RIZWAN ALI RIZWAN
ताकि जन्नत में मैं पहुँच जाऊँ मुझ को रक्खा गया अज़ाबों में — RIZWAN ALI RIZWAN
हद से गुज़र के दर्द तो तस्कीन हो गया पर मैं तिरे फ़िराक़ में बे-चैन ही रहा — RIZWAN ALI RIZWAN
मुहब्बत क्या है तुम जाने नहीं हो अभी तुम ख़ाक को छाने नहीं हो — RIZWAN ALI RIZWAN
तुम्हें इक नज़्म में लाएँ तो कैसे कि तुम तस्बीह के दाने नहीं हो — RIZWAN ALI RIZWAN
तेरी ज़ुल्फ़ों का क्या बयान करूँँ तेरी नालैन अर्श पर जानाँ — RIZWAN ALI RIZWAN
दर्द-आमेज़ ज़िन्दगी कर ले तेरा दुख ही तेरी दवा होगा — RIZWAN ALI RIZWAN
दोनों जानिब से कुछ हुआ था मगर फिर हुआ ये कि कुछ हुआ ही नहीं — RIZWAN ALI RIZWAN
ये भी इक मसअला है क्या करें अब समुंदर डूब मरना चाहता है — RIZWAN ALI RIZWAN
क्या तुझे राज़-ए-निहाँ बतलाऊँ दर्द इन्साँ के लिए नेमत है — RIZWAN ALI RIZWAN
हिज्र के अँधेरों से दिल बुझा सा रहता है इस चराग़-ए-उल्फ़त को वस्ल की ज़िया दे दो — RIZWAN ALI RIZWAN
ना चराग़-ए-बज़्म हूँ ना रौनक़-ए-मह़फ़िल हूँ मैं जो दिल-ए-वीराँ से निकली वो सदा-ए-दिल हूँ मैं — RIZWAN ALI RIZWAN
सब यहाँ आईना दिखाते हैं आईना कोई देखता ही नहीं — RIZWAN ALI RIZWAN
ऐसे आई वुजूद में दुनिया उस ने चुपके से कह दिया था कुन — RIZWAN ALI RIZWAN
जीत लेता हूँ मैं ग़ज़ल कह कर जिस को कहते हैं दिल ज़माने में — RIZWAN ALI RIZWAN
ठहरते भी भला कैसे वो दिल के बाला ख़ानों में उन्हें मेरी निगाहों से उतर जाने की जल्दी थी — RIZWAN ALI RIZWAN

Ghazal

कूचा-ए-इश्क़ में बदनाम हुई जाती है ज़िंदगी दर्द का पैग़ाम हुई जाती है मेरी आँखों से लहू बन के गिरे हैं मोती बे-कली इश्क़ का अंजाम हुई जाती है ज़िंदगी है मेरी इक यौम-ए-ग़रीबाँ जिस में सुब्ह आई नहीं और शाम हुई जाती है तेरी फ़ुर्क़त में मेरी ज़िंदगी जान-ए-जानाँ मंज़िल-ए-मर्ग से दो-गाम हुई जाती है अब कहाँ अब्र के पर्दे में क़मर रहता है हुस्न की जल्वा-गरी आम हुई जाती है ख़ंजर-ए-हिज्र से ऐ जान-ए-तमन्ना, दिल में वो ख़लिश है कि जो आराम हुई जाती है अब तो ये हाल है मेरा कि तेरी मह़फ़िल में मेरी ख़ामोशी भी पैग़ाम हुई जाती है — RIZWAN ALI RIZWAN