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SZUBAIR KHAN KHAN
SHER
शम्अ' कब तक जलाए हाथों में
ये भी बेटी जहाँ से कहती है
SZUBAIR KHAN KHAN
10
SHER
थी न कुछ भी ख़ता मेरे दिल की
तोड़ के दिल हमें जताया है
SZUBAIR KHAN KHAN
9
SHER
शोर ग़ुल रोज़ होता है तेरा
पूछता हूँ मैं माजरा क्या है
SZUBAIR KHAN KHAN
8
SHER
ग़म नहीं थे तो फिर भी अच्छा था
आज ग़म है कहाँ ये अच्छा है
SZUBAIR KHAN KHAN
7
SHER
ऐ ख़ुदा ख़ाक कर तू दुनिया को
ये न ही तेरी है न ही मेरी
SZUBAIR KHAN KHAN
6
SHER
मैं परिंदा ज़बान रखता हूँ
देख के बोलना नहीं आता
SZUBAIR KHAN KHAN
5
SHER
कोई दुनिया में है नहीं ऐसा
दर्द ग़म बाँट ले दुआ कर दे
SZUBAIR KHAN KHAN
4
SHER
वो हमें ख़ाक कर रहे होंगे
हुस्न की आग को धुआँ कर के
SZUBAIR KHAN KHAN
3
SHER
बे-ख़बर तू बना हुआ ख़ुद से
जानता हैं तिरी ख़ता क्या है
SZUBAIR KHAN KHAN
2
SHER
ज़िंदगी में गिला अगर होता
हम तुम्हें 'आशिक़ी नहीं कहते
SZUBAIR KHAN KHAN
1
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