arjun  chamoli

Top 10 of arjun chamoli

    मैं ग़मों की धूप में जल गया तो पता चला मुझे छाँव का
    वो तो दूर रह के भी पास था मुझे फ़ासलों का गुमाँ रहा
    arjun chamoli
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    उफान हो तो समुंदर जगह बदलता है
    है दिल में ज़ख़्म लहू आँख से निकलता है

    मैं जल गया तो सलीक़ा मिला उजालों को
    वो कौन है जो मिरे इस हुनर से जलता है

    मिरी तलाश की कोशिश किसे दिखाए वो
    मैं तो नज़र में हूँ फिर काहे वो मचलता है

    बुझा के मुझ को किसी और को किया रौशन
    वो शख़्स कौन है जो मुझ से बढ़ के जलता है

    मेरा चराग़ बुझाने को फूँक मारे वो
    ये वो चराग़ है जो आँधियों में पलता है

    वो लुत्फ़-ए-हिज्र में क्या जानता मसर्रत को
    वो इश्क़ करते हुए रंग ख़ुद बदलता है

    वो जो मिरी ही ग़ज़ल से बना रहा शोहरत
    कि शे'र बोल रहा लफ़्ज़ क्यूँ फिसलता है

    मैं हारता ही गया सुल्ह करने की ख़ातिर
    वो जीत कर भी मिरी मुंसिफ़ी से जलता है

    मैं ख़ामुशी से गुज़रता रहा उठा के ग़म
    दिखा के दर्द तो हर शख़्स हाथ मलता है

    जहाँ में इश्क़ की ता'बीर तक अधूरी है
    कि मुफ़्लिसी में मिरा यार भी बदलता है

    नज़र मिला जो सकूँ आइना भी झुक जाए
    अज़ाब इतना बढ़ा अक्स से निकलता है

    वो जाम हूँ मैं छलकता नहीं है हाथों से
    मिरा वुजूद नशे में भी राह चलता है

    हुनर किसी का ज़माना नहीं मिटा सकता
    ये बात और है मुक़द्दर समाँ बदलता है
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    arjun chamoli
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    बयाँ होती नहीं तेरी नज़ाकत चंद लफ़्ज़ों में
    बयाँ होती तो हो जाती क़ियामत चंद लफ़्ज़ों में

    मिरा हर रास्ता तेरी ही गलियों से गुज़रता है
    दरीचा बंद था सुन ले शिकायत चंद लफ़्ज़ों में

    किया सज्दा बड़ा तेरा तुझे पाने की कोशिश में
    कि पूरी हो नहीं सकती इबादत चंद लफ़्ज़ों में

    किसी शाइ'र की ग़ज़लों में तिरा ये नाम गर आया
    मैं उस शाइ'र की कर दूँगा ज़लालत चंद लफ़्ज़ों में

    सुना है शहर भर तेरी ही चर्चा है दिवानों में
    मिटा दूँगा या उन को दे हिदायत चंद लफ़्ज़ों में

    ये दुनिया गर तुझे देखे मुझे तकलीफ़ होती है
    जलन के नाम पर लिख दी इबारत चंद लफ़्ज़ों में

    शरीफ़ों ने भी तेरा नाम लिख डाला किताबों में
    मैं भर दूँ शहर की हर इक इमारत चंद लफ़्ज़ों में

    तिरा बस नाम लेते ही फ़ज़ाओं में घुली ख़ुशबू
    फ़ज़ाएँ भी करे तेरी वकालत चंद लफ़्ज़ों में

    क़सम तुझ को मिरी ज़ीनत मिरी हर साँस तेरी है
    मिरे मरने से पहले सुन मोहब्बत चंद लफ़्ज़ों में
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    arjun chamoli
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    “मेरा गुनाह”
    तूफ़ान ने भी मुझ को ही इल्ज़ाम दिया
    कमज़ोर दरख़्त था इस लिए गिर गया
    अभी तो मैं पूरा सूखा भी नहीं था
    कि लोगों ने शाख़ों को काट लिया

    जिन्हें राह में मैं ने छाया दी और फल दिए
    बारिश से बचाया और भीगने नहीं दिया
    वो घर उठा ले गए मुझे अर्थी की तरह
    उन्होंने भी मुझ पर कोई तरस नहीं किया

    शाम को अँगीठी में ठूँसा और आग दिखाई
    ख़ुद को ठंड से बचाने को मुझे जला दिया
    फिर भी उन की नज़रों में मैं ने गुनाह किया
    कि गिरने के बा'द कोई फल नहीं दिया
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    arjun chamoli
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    ये बात तुम बस कह दो ये पल ठहर जाए
    मैं सज्दे में झुकता हूँ फिर उठ न सर पाए
    arjun chamoli
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    हसरतें आरज़ू कुछ अधूरे बयाँ
    दिल को बर्बाद करने को काफ़ी थे ये
    arjun chamoli
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    ग़म का प्याला जो छलकाएगा
    इश्क़ को रुस्वा कर जाएगा
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    उन की गली ज़िंदा है मेरे तसव्वुर में आज
    उन की गली में दिल का धड़कना याद आता है
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