उफान हो तो समुंदर जगह बदलता है
है दिल में ज़ख़्म लहू आँख से निकलता है
मैं जल गया तो सलीक़ा मिला उजालों को
वो कौन है जो मिरे इस हुनर से जलता है
मिरी तलाश की कोशिश किसे दिखाए वो
मैं तो नज़र में हूँ फिर काहे वो मचलता है
बुझा के मुझ को किसी और को किया रौशन
वो शख़्स कौन है जो मुझ से बढ़ के जलता है
मेरा चराग़ बुझाने को फूँक मारे वो
ये वो चराग़ है जो आँधियों में पलता है
वो लुत्फ़-ए-हिज्र में क्या जानता मसर्रत को
वो इश्क़ करते हुए रंग ख़ुद बदलता है
वो जो मिरी ही ग़ज़ल से बना रहा शोहरत
कि शे'र बोल रहा लफ़्ज़ क्यूँ फिसलता है
मैं हारता ही गया सुल्ह करने की ख़ातिर
वो जीत कर भी मिरी मुंसिफ़ी से जलता है
मैं ख़ामुशी से गुज़रता रहा उठा के ग़म
दिखा के दर्द तो हर शख़्स हाथ मलता है
जहाँ में इश्क़ की ता'बीर तक अधूरी है
कि मुफ़्लिसी में मिरा यार भी बदलता है
नज़र मिला जो सकूँ आइना भी झुक जाए
अज़ाब इतना बढ़ा अक्स से निकलता है
वो जाम हूँ मैं छलकता नहीं है हाथों से
मिरा वुजूद नशे में भी राह चलता है
हुनर किसी का ज़माना नहीं मिटा सकता
ये बात और है मुक़द्दर समाँ बदलता है















