door bhi jaate hue paas bhi aate hue ham | दूर भी जाते हुए पास भी आते हुए हम

  - Zia Zameer

दूर भी जाते हुए पास भी आते हुए हम
भूलते भूलते कुछ याद दिलाते हुए हम

नींद का इस को नशा हम को जगाने की हवस
ख़्वाब में आते हुए नींद चुराते हुए हम

पहले रोते हुए अपनी ही निगहबानी में
और बे-साख़्ता फिर ख़ुद को हँसाते हुए हम

पिछली शब पोंछते आँखों से पुराने सभी ख़्वाब
अगली शब ख़्वाबों का अम्बार लगाते हुए हम

चारागर बनते हुए अपनी ही वीरानी में
पहली बारिश में अकेले ही नहाते हुए हम

ख़ून अरमानों का करते हुए ख़ामोशी से
और फिर ख़ून को आँखों में छुपाते हुए हम

अपनी झोली में किसी जीत का नश्शा सा लिए
उस के कूचे से 'ज़िया' हार के जाते हुए हैं हम

  - Zia Zameer

Neend Shayari

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