phone to door vahaañ khat bhi nahin pahunchege | फ़ोन तो दूर वहाँ ख़त भी नहीं पहुँचेंगे

  - Zia Mazkoor

फ़ोन तो दूर वहाँ ख़त भी नहीं पहुँचेंगे
अब के ये लोग तुम्हें ऐसी जगह भेजेंगे

ज़िंदगी देख चुके तुझ को बड़े पर्दे पर
आज के बअ'द कोई फ़िल्म नहीं देखेंगे

मसअला ये है मैं दुश्मन के क़रीं पहुँचूँगा
और कबूतर मिरी तलवार पे आ बैठेंगे

हम को इक बार किनारों से निकल जाने दो
फिर तो सैलाब के पानी की तरह फैलेंगे

तू वो दरिया है अगर जल्दी नहीं की तू ने
ख़ुद समुंदर तुझे मिलने के लिए आएँगे
सग़ा-ए-राज़ में रक्खेंगे नहीं 'इश्क़ तिरा
हम तिरे नाम से ख़ुशबू की दुकाँ खोलेंगे

  - Zia Mazkoor

Ishq Shayari

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