रात ढल जाएगी तब लौट के घर जाऊँगा
क़ुर्ब-ए-तन्हाई से वरना मैं बिखर जाऊँगा
बस यही सोच के सूरज की तरह तन्हा हूँ
ग़म के शोलों में पिघल कर मैं निखर जाऊँगा
तू मिरा है तो मिरे सामने हर पल रहना
तू ने मुँह मोड़ लिया गर तो किधर जाऊँगा
— Zohair Ahmad Sahil
क़ुर्ब-ए-तन्हाई से वरना मैं बिखर जाऊँगा
बस यही सोच के सूरज की तरह तन्हा हूँ
ग़म के शोलों में पिघल कर मैं निखर जाऊँगा
तू मिरा है तो मिरे सामने हर पल रहना
तू ने मुँह मोड़ लिया गर तो किधर जाऊँगा
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