उस दिल में मैं बसा नहीं क्या फ़र्ज़ की अदा नहींवो कहती हैं वफ़ा नहीं क्या मर्ज़ की दवा नहींग़म तो बहुत मिले मगर ये ज़ख़्म तो सिला नहींतकलीफ़ क्या कहें मगर उस रस्ते से गिला नहीं— Zohair Ahmad Sahil