बयाँ करते बहुत सोचा हुआ सा कुछ
मगर बस रह गया उलझा हुआ सा कुछ
अभी ही दिल की अलमारी समेटी है
मिलेगा कल यहाँ बिखरा हुआ सा कुछ
हयाती में हयाती थी तिरे होते
बचा है अब तो बस थोपा हुआ सा कुछ
घना जंगल दबा कंक्रीट के नीचे
खिले फिर भी वहाँ महका हुआ सा कुछ
सिवा मेरे मुझे था और क्या हासिल
पर अब है रूह में पनपा हुआ सा कुछ
ग़ुरूर-ए-हुस्न का मस्कन रहे दो दिन
बक़ाया दिन है बस उजड़ा हुआ सा कुछ
यतीमों में हुनर ये क़ाबिल-ए-तारीफ़
कि ख़ुद में वो रखें पाला हुआ सा कुछ
लड़कपन में बिलखना भी मुनासिब था
ग़ज़ल में अब रखूँ सहमा हुआ सा कुछ
— kapil verma















