याद की टीस में जीने के अब तरीक़े मिले हैं कई
वक़्त की डोर से मैं ने भी ज़ख़्म दिल के सिले हैं कई
ज़िंदगी से हमेशा अमीरों के शिकवे-गिले हैं कई
सब्र के फूल ग़ुर्बत की मिट्टी में अक्सर खिले हैं कई
सोहबतें हैं कई तोहमतें हैं कई सब्र रखना ज़रा
इस रह-ए-शौक़ में हर नए रंग के सिलसिले हैं कई
काविशों से तराशी तिरी राह ये राएगाँ तो नहीं
रुक ज़रा देख मुड़कर भी पीछे तिरे क़ाफ़िले हैं कई
नक़्श-ए-निय्यत ख़ुद अपना बदलता रहा हूँ मसाइल के साथ
मुल्क-ए-दिल में मिरे मतलबी वहशियों के ज़िले हैं कई
— kapil verma















