मैं संग-दिल दम-ब-दम ग़ुबार-ए-सितम से लबरेज़ चल रहा हूँ
मगर जहाँ माँ की याद आए वहाँ सरासर पिघल रहा हूँ
शिकस्त मिलने से ही तो अपनी कहानियाँ यादगार होंगी
शिकस्ता-दिल को इसी हिकायत से मैं मह-ओ-साल छल रहा हूँ
दुकान में शर्मसार सच पर नज़र नहीं डालता है कोई
इसीलिए तो ग़ज़ल बना कर मैं सच की सूरत बदल रहा हूँ
नहीं है तूफ़ान की ख़ता ये कि लौ मिरी नातवाँ है इस दम
क़ुबूलियत है ये हार की अब मैं आख़िरी बार जल रहा हूँ
बड़े सलीक़े से पार करता चलूँ नदी-वादियाँ हज़ारों
मगर तिरी याद की ज़मीं पर मैं बे-तहाशा फिसल रहा हूँ
शदीद होकर सताएँ मुझ को सराब कुछ मंज़रों के तेरे
निकाल कर दिल बदन से तेरी गली से जब भी निकल रहा हूँ
— kapil verma















