रात ग़म की यूँँ सँवारे जा रहा हूँ
दिल मिरा दुश्मन को मैं दे जा रहा हूँ
याद की दहशत में जीना सीखकर मैं
मोह के धागे समेटे जा रहा हूँ
घूँट कुछ उम्मीद के पीते पिलाते
भीड़ में तन्हा कराहे जा रहा हूँ
मात ही मिलती है मोती तो नहीं ख़ैर
फिर भी गोते मैं लगाए जा रहा हूँ
जो जबीं पर हो शिकन मंज़ूर तो बात
बिन मदद सब यूँ भी झेले जा रहा हूँ
ज़िंदगी करती है जो शह-मात हर चाल
खेल बीचों-बीच छोड़े जा रहा हूँ
ला-दवा है ये मरज़ दूभर हैं राहें
फिर भी मुँह शिकवों से फेरे जा रहा हूँ
आसरों की सब उमीदें हैं फ़ुज़ूली
गोया रूई सा मैं बिखरे जा रहा हूँ
सब अहम किरदार गिरते जा रहे हैं
सो मैं ख़ुद को ख़ुद से जोड़े जा रहा हूँ















