अकेले प्रीति हम सेे कोई गाई ही नहीं जाती

बिना उस के कभी भी धुन बनाई ही नहीं जाती

खलिश कैसी सभी करते हैं चुपके और चुपके से
मगर देखो मुहब्बत तो सिखाई ही नहीं जाती

सिलेबस में हमारे सब है आता जानलो तुम सब
मुहब्बत की किताबें जो पढ़ाई ही नहीं जाती

महज़ उस के पड़े हैं चैट सारे फोन में मेरे
बता देना कभी यादें मिटाई ही नहीं जाती

मुहब्बत कौन थी पहली बताऊँ, यार छोड़ो भी
ग़ज़ल कोई अधूरी तो सुनाई ही नहीं जाती

न जाने लोग कैसे? इश्क़ भी दो-चार करते हैं
यहाँ पहली मुहब्बत तो भुलाई ही नहीं जाती

— Aakash Kumar yadav

More by Aakash Kumar yadav

Other ghazal from the same pen

See all from Aakash Kumar yadav →

Aadmi Shayari

Shers of aadmi.

All Aadmi Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling