
जो कुछ है तिरे ग़म में हुआ क्यूँ नहीं सुनता
ऐ शख़्स मिरे दिल की सदा क्यूँ नहीं सुनता
ये सोच के रोता हूँ की रोने की सदाएँ
इंसान तो सुनता है ख़ुदा क्यूँ नहीं सुनता
— Abid aseer
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