ख़्वाहिश है एक रोज़ तेरी ख़ूबियाँ गिनूँ
दरिया में आँखें डाल के मैं मछलियाँ गिनूँ
ढलती हुई ये शाम है हाथों में तेरा हाथ
अब शा'इरी करूँ कि तेरी चूड़ियाँ गिनूँ
शामिल हो मेरी याद में लोगों की एक भीड़
तन्हा कहीं पे बैठ के मैं हिचकियाँ गिनूँ
आया हूँ जब से गाँव इसी सोच में हूँ मैं
माँ के सफ़ेद बाल या फिर छुट्टियाँ गिनूँ
तू ही बता दे यार मैं काग़ज़ के ढेर में
अपनी शिकायतें या तेरी चिट्ठियाँ गिनूँ
सोचा है तुझ को शक़्ल दूँ ऊँचे मकान की
चढ़ते उतरते रोज़ तेरी सीढ़ियाँ गिनूँ
मैं चाहता हूँ तुझ पे कोई फल लगे कभी
ऐ पेड़ कब तलक मैं तेरी पत्तियाँ गिनूँ
— Aditya Singh aadi














