tishnagi thii mulaqaat kius se haan maine phir baat ki | तिश्नगी थी मुलाक़ात की

  - Mohd Afsar

तिश्नगी थी मुलाक़ात की
उस से हाँ मैंने फिर बात की

दुश्मनी मेरी अब मौत से
ज़िंदगी हाथ पे हाथ की

सादगी उसकी देखा हूँ मैं
हाँ वो लड़की है देहात की

तुमने वा'दा किया था कभी
याद है बात वो रात की

अब मैं कैसे कहूँ 'इश्क़ इसे
बात जब आ गई ज़ात की

मुझ सेे क्या दुश्मनी ऐ घटा
क्यूँ मेरे घर पे बरसात की

हमको मालिक ने जितना दिया
सब ग़रीबों में ख़ैरात की

तू कभी मिल तो मालूम हो
क्या है औक़ात औक़ात की

  - Mohd Afsar

Intiqam Shayari

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