
नहीं थी नौकरी कोई नहीं कोई था घर मेरा
मोहब्बत के सहारे ही भला कब तक गुज़र होती
अगर कुछ पगड़ियों ने कर लिया होता भरोसा तो
सफ़र भी ख़ूब-सूरत और वो भी हम सफ़र होती
— Ajay Choubey
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