लोग कहते हैं कि बेहतर हो गया हूँ
सच मगर ये है कि पत्थर हो गया हूँ
हूँ लगा मैं आज भी तो सीढ़ियों पर
कहने को ही संग-ए-मरमर हो गया हूँ
मैं न जानूँ क्या वजह है ज़िंदगी की
मौत से भी मैं तो बदतर हो गया हूँ
दूर रहते हैं सभी अब मीठे दरिया
खारे पानी का समुंदर हो गया हूँ
जैसे चाहे वो नचाता है मुझे तो
उस मदारी का मैं बंदर हो गया हूँ
वो कहानी जब पढ़ी तो जान पाया
तुम सुधा सी और मैं चंदर हो गया हूँ
सब जहाँ के गुल खिला बैठे 'गुरू' तुम
और कहते हो कि बंजर हो गया हूँ
— Amit Rajvanshi 'Guru'















