तेरा ख़याल
लहू का इक इक कतरा जला हैं
तब जाके तेरा ख़याल मिला हैं
हर हर्फ में तलाश छूपी हैं तेरी
तेरी तहरीर को क़लम भूखी हैं मेरी
समुंदर का पानी जब स्याही बन जाए
तुझे लिखना सफ़र हैं क्यूँ ना तू राही बन जाएँ
गालिब का शे'र हैं या मीर की ग़ज़ल हैं तू
सादगी के आब से भरा क्या बादल हैं तू
तू हैं घटा तो फिर बरसती क्यूँ नहीं
मैं तडपता हूँ , तू भी तरसती क्यूँ नहीं
तू नहीं हैं तब भी कुछ कलाम लिख रहा हूँ मैं
कितनी ख़मोशी से कागज़ो पें चिख रहा हूँ मैं
जाम से सिचाँ होगा तब जा के तू खिला हैं
मैं ने आज हैं यादों के परबत तोडे
तब जा के तेरा ख़याल मिला हैं
— Amol















