हवा में उड़ के न जाओ दयार अपना है

तुम्हें जो ढूँढ़ ले ऐसा रडार अपना है

जो मन के तार से स्वर चाहतों का भर देगा
तुम्हारी बज़्म का महँगा सितार अपना है

न आई नींद मुझे और न चैन है दिल को
मिलन के वास्ते ये इंतिज़ार अपना है

पढा जो उन की नज़र को तो ये लगा मुझ को
वो जैसे कह रही हों ये शिकार अपना है

न होश ख़ुद का न गैरों की फ़िक्र है साक़ी
तुम्हारे इश्क़ में चढ़ता ख़ुमार अपना है

ज़माना लाख बुरा चाहे फ़र्क़ क्या पड़ना
सनम के प्यार पे जब ऐतिबार अपना है

— Anjuman rahi raza

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