तुम्हारे शहर में गर हम ठहर गए होते
रक़ीब पर ही हमारा क़तर गए होते
अगर न मिलती हमें तुम सेे ये पज़ीराई
हमारे ख़्वाब यकीनन बिखर गए होते
किया है जितना ज़माने ने तब्सिरा उन पर
न होता 'इश्क़ तो कब के वो मर गए होते
रहा ये अच्छा नहीं आए मैक़दे में हम
वग़रना जाम भी हद से गुज़र गए होते
वो दफ़अतन ही अगर मेरे रूबरू होता
तमाम ज़ख़्म पुराने उभर गए होते
असर वफाओं का क़ाएम रखा मुझे वरना
नज़र से हम भी किसी दिन उतर गए होते
हुजूर 'इश्क़ निभाने की क्या ज़रूरत थी
बला से आप भी हँसकर मुकर गए होते
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